Thursday, July 12, 2018

आज के परिवेश में संयुक्त परिवार का महत्त्व

कई कारणों से संयुक्त परिवारों के बिखराव का वर्तमान दौर मे आज भी परिवारों का महत्त्व कम नहीं हुआ है

1- परिवार आज भी न्याय के सिद्धांत की शिक्षा देती हुई दिख रही है । हर व्यक्ति को अनुशासन का पाठ के साथ यह  दूसरे सदस्यों को बाँटना सीखाती है। वो चाहे भौतिक हो अभौतिक । ख़ुशी हो या गम । खाना हो या पीना । इसी कारण आज भी परिवार के सदस्यों मे आपसी सामंजस्य एवं समन्वय की भावना होती है और बच्चों में सोहार्द की भावना होती है अर्थात् बच्चे मिलनसार होते है और किसी भी भेदभाव से मुक्त होते हैं।

2- व्यक्ति आज संस्कार से हीन हो रहा है क्यों कि उसको इसकी शिक्षा देने वाला कोई अपना नहीं है । परिवार ही  संस्कारों के देने की पहली सीढ़ी होता है। बच्चों का पालन और मानसिक विकास की शुरुवात यही  से होता है । वहीं दूसरी ओर जीबन के अंतिम पड़ाव पर बुजुर्ग पीढ़ी का अंतिम समय भी शांति और खुशी से गुजरता है। वह अपनी सामान्य जरूरतों और जीवन यापन की जरूरतों की पूर्ति कर पाते हैं। और अपने अनुभव बच्चो को प्यार और डांट डपट कर देते है। बच्चे परिवार में दादा-दादी, बुआ आदि के प्यार की छांव में खेलते-कूदते और संस्कारों को पाते हुए बड़े हो। इस प्रकार परिवार एक इंसान को बड़ा करता है और एक पूर्ण मानव जाति में विकसित करता है। ये सुरक्षा और प्यार का वातावरण उपलब्ध कराता है जो हमारी खुशी और समस्याओं को बाँटने में मदद करता है।

3- अक्सर एक बड़े परिवार मे बच्चों को एक अच्छा माहौल मिलता है साथ ही एक जैसे living satandered केे समान आयु वर्ग के मित्र मिलते हैं जो परिवार की नयी पीढ़ी को बिना रुकावट के पढ़ाई, खेल और अन्य दूसरी क्रियाओं में अच्छी सफलता अर्जन और एक दूसरे को समझने मे साथ देते है।

4- परिवार के मुखिया यानी सबसे बड़े  की बात मानने के साथ ही साथ  परिवार के छोटे सदस्य ज़िम्मेदार और अनुशासित का पाठ पढ़ते हैं। सम्मान, संयम और सहयोग की संयुक्त परिवार मे संयुक्त उर्जा का जन्म होता है जो कि मानसिक और शारीरिक कष्टों को काम करती है।

5- परिवार एक व्यक्ति को भावनात्मक और मानसिक  रुप से शक्तिशाली, ईमानदार और आत्मविश्वासी और आज्ञाकारी  बनाते है। अकेला व्यक्ति आज समस्या से घबरा कर टूटते  हुए जीबन को समाप्ति करते दिख रहे है। इसका कारण समय पर साथ देने वाले उसके अपने नहीं है। ऐसे मे संयुक्त परिवारों में आस पास कई लोगों की मौजूदगी एक सहारे का काम करती है।

6- परिवार बाहरी विरोधों से व्यक्ति सुरक्षा प्रदान कराता है।परिवार के प्रत्येक सदस्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी सभी सदस्य  मिलजुल कर निभाते  हैं। अतः किसी भी सदस्य की आर्थिक , स्वास्थ्य ,सुरक्षा की  समस्या पूरे परिवार की होती है। किसी प्रकार की अनपेक्षित रूप से आयी परेशानी सहजता से सुलझा ली जाती है। यदि कोई गंभीर बीमारी से जूझता है तो भी परिवार के सब सदस्य अपने सहयोग से उसको बीमारी से निजात दिलाने में मदद करते है उसे कोई आर्थिक समस्या या रोजगार की संसय अड़े नहीं आती है तो सभी संगठित होकर एक दूसरे की  सुरक्षा करते है।

7- परिवार मे आर्थिक समस्या या रोजगार की समस्या आड़े नहीं आती, एकजुटता के कारण ऐसे ही गाँव / मोहल्ले का कोई भी उनसे पंगा लेने की हिम्मत नहीं करता.  संगठित होना पूर्ण  सुरक्षा प्रदान करता है और व्यक्ति हर प्रकार के तनाव से मुक्त रहता है .

8- परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होने के कारण कार्यों का विभाजन आसान हो जाता है .परिवार के प्रत्येक सदस्य के हिस्से में आने वाले कार्य को हर सदस्य  वह अधिक क्षमता से कर पता है .और विभिन्न अन्य जिम्मेदारियों से भी मुक्त रहता है. अतः तनाव मुक्त हो कर कार्य करने में अधिक ख़ुशी मिलती है .उसकी कार्य क्षमता अधिक होने से कारोबार अधिक उन्नत होता है .परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ती अपेक्षाकृत अधिक होती है।

9- परिवार बच्चों के लिए सर्वाधिक सुरक्षित जगह है जहा उसका शारीरिक एवं चारित्रिक विकास का अवसर प्राप्त होता है .बच्चे की इच्छाओं और आवश्यकताओं का अधिक ध्यान रखा जा सकता है .उसे अन्य बच्चों के साथ खेलने का मौका मिलता है .माता पिता के साथ साथ अन्य परिजनों विशेष तौर पर दादा ,दादी का प्यार भी मिलता है . बुजुर्गो से उनको  ज्ञान ,अनुभव  मिलता है .उनके साथ खेलने , समय बिताने से मनोरंजन भी होता है उन्हें संस्कारवान ,चरित्रवान,एवं हिर्ष्ट पुष्ट बनाने में अनेक परिजनों का सहयोग प्राप्त होता है .

10- बाजार का नियम है की यदि कोई वस्तु अधिक परिमाण में खरीदी जाती है तो उसके लिए कम कीमत चुकानी पड़ती है .अर्थात संयुक्त रहने के कारण कोई भी वस्तु अपेक्षाकृत अधिक मात्रा  में खरीदनी होती है अतः बड़ी मात्र में वस्तुओं को खरीदना सस्ता पड़ता है .दूसरी बात अलग अलग रहने से अनेक वस्तुएं अलग अलग खरीदनी पड़ती है जबकि संयुक्त रहने पर कम वस्तु लेकर काम चल जाता है। जैसे तीन एकल परिवारों के रूप में रहने पर उन्हें तीन मकान ,तीन कार या तीन बाइक  ,तीन टेलीविजन ,और तीन फ्रिज  आदि के रूप मे प्रत्येक वस्तु को अलग अलग खरीदना होगा .परन्तु वे यदि एक साथ रहते हैं उन्हें कम मात्र में वस्तुएं खरीद कर बचत कर सकते है जैसे तीन बाइक के स्थान पर एक कार ,एक बाइक से कम चल सकता है ,तीन फ्रिज और एसी के स्थान पर एक बड़ा फ्रिज एसी लिया जा सकता है इसी प्रकार तीन मकानों के साथ पर एक बड़ा सा बंगला लिया जा सकता है। इस प्रकार से उतने ही बजट में अधिक उच्च जीवनशैली के साथ जीवन यापन किया जा सकता है।

11- पूरे परिवार के सबका सहयोग आसानी से  पाया जा सकता किसी विपत्ति के समय या बीमार होने पर,परिवार के सभी सदस्य सहयोग करते है. कभी भी आर्थिक समस्या या रोजगार चले जाने की समस्या उत्पन्न नहीं होती क्योंकि एक सदस्य की अनुपस्थिति में अन्य परिजन कारोबार को देख लेते हैं .

12- परिवार में सभी सदस्य एक दूसरे के आचार व्यव्हार पर निरंतर निगरानी बनाये  रखते हैं ,किसी की अवांछनीय गतिविधि पर अंकुश लगा रहता है .अर्थात प्रत्येक सदस्य चरित्रवान बना रहता है इस प्रकार परिवार  चरित्र निर्माण में सहयोग करता ऐसे मे बिना किसी समस्या के समय पर सभी परिजन उसका साथ देते हैं और सभी पर सामूहिक दबाव भी पड़ता है जिसके कारण कोई भी सदस्य असामाजिक कार्य जैसे शराब जुआ या अन्य कोई नशा नहीं कार पता इनसे  बचा रहता है

13- परिवार की समस्याओं से भी लाभ होता है. कई समस्याओं के रूप में वे हमारे जीवन का हिस्सा हो सकता है, जैसे हम दिन प्रतिदिन उनका सामना करते हैं लेकिन वे समस्याएं दोष देने का कारण नहीं हो सकती और एकल परिवार को त्याग कर संयुक्त परिवार के सभी लाभों काभी  आनन्द लें.

14- परिवार समाज और देश के लिये खुश, सक्रिय, जल्दी सीखने वाला और बेहतर नयी पीढ़ी उपलब्ध कराती है।
एक संयुक्त परिवार का आनंद तभी आ सकता है अगर वहाँ परिवार के सदस्यों के बीच एक अच्छी सोच है. नहीं तो जैसे ही भेदभाव उत्पन्न होंगे यह परिवार को बनाए रखने में बहुत मुश्किल हो जाता है

निष्कर्ष - परिवार का बुनियादी स्तंभ सभी सदस्यों के लिए स्वस्थ और निस्वार्थ नैतिक मूल्यों का है. यह एक निर्विवाद मुखिया के द्वारा नियंत्रित भी होना चाहिए, जो रहन सहन को सुधारने के लिए निर्णय ले। परिवार मे छोटे हमेशा एक बड़े बुजुर्ग से मार्गदर्शन लेते है. जो कि अधिक अनुभवी  होते हैं. चुकि वहाँ हमेशा एक पीढ़ी का अंतर होता है । ऐसे मे युवा, हमेशा इससे सहमत नहीं होगा कि बुजुर्ग क्या कह रहे हैं  तो वहाँ कुछ समय विसंगति टकराव और मतभेद हो सकते  हैं. क्यों कि संयुक्त परिवारों में राय भिन्न - भिन्न हो सकती है। ऐसे मे फायदे अनेक है नुकसान कम।

Friday, November 4, 2016

छठ : एक लोक पर्व

छठ : एक लोक पर्व

सामान्यतया जन उसे ही स्वीकार करता है जो उसके बीच का और उस जैसा ही हो। इसीलिए आम ने सूर्य की शक्तियों और उसकी ऊर्जा का मानवीकरण छठ मैया के रूप में कर ख़ास रूप दे दिया है । भारतीय संस्कृति और लोकगीतों में छठ का यही आधारभूत रूप रंग दीखता है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि का यह दिन भगवान सूर्य को समर्पित है।

बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के निवासी इस दिन जहां भी होते हैं सूर्य भगवान की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना नहीं भूलते. यही कारण है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।

इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है इसलिए इस पर्व को महिलाओं का हठयोग भी कहा जा सकता है।

प्रारम्भ होने की मान्यताएं :-

1- भगवान राम और सीता ने सर्वप्रथम इसकी पूजा की थी । भगवान राम सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता भगवान् सूर्य थे। और जब भगवान राम लंका से रावण का वध कर सीता के साथ अयोध्या वापस लौटे । रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक अपने कुलदेवता सूर्य का आशीर्वाद पाने के लिए इन्होंने अपनी पत्नी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा। और सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज प्रारम्भ किया। तभी से आमजन इस पर्व को मना रहे है।

2- ऐसी मान्यता है कि कुंती पुत्र कर्ण को दुर्योधन ने अपना मित्र बनाकर आज का भागलपुर बिहार का राजा बना दिया। कर्ण की माता कुंती और पिता सूर्य है। और इसके पूज्य देव सूर्य थे। कर्ण इनकी उपासना नित्य कमर तक पानी में जाकर करता था और पूजा के बाद जरुरतमंदों को दान भी देता था। वर्ष मे एक बार कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य की विशेष पूजा किया करता था।  सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।

3- छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। इस प्रकार यह व्रत पारिवारिक खुशहाली के लिए किया जाता हैं। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

4- छठ पर्व को लेकर एक मान्यता यह भी है कि साधु की हत्या के प्रायश्चित के लिए जब पांडु अपनी पत्नी कुंती और मादरी के साथ वन में थे तब पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी। इससे कुंती गर्भवती हुई और उसको पुत्र प्राप्त हुआ ।आज भी संतान प्राप्ति के लिए इसका।महत्व जुड़ गया तब से यह व्रत से संतान सुख प्राप्त के लिए किया जाता है।

5- पुराणों के अनुसार मनु - प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने इसके लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ किया । इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ। मृत शिशु को छाती से लगाकर प्रियव्रत और उनकी पत्नी विलाप करने लगी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक ज्योतियुक्त विमान पृथ्वी की ओर आया जिसमे एक नारी बैठी है। देवी ने खुद को ब्रह्मा की मानस पुत्री बताया और कहा कि वो संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों संतान प्रदान करती है वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं।
देवी स्पर्श से मृत बालक जीवित हो उठा। महाराज के विनय पर देवी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो। राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की। और तभी से छठ पूजा पूत्रोंं की दीर्घ आयु के लिए मनायी जाती है। और इसे संतान प्राप्ति की इच्छा से किया जाता हैं।

सामाजिक- सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक महत्व :

1- सम्पूर्ण जगत में सूर्य एकमात्र अक्षय ऊर्जा के स्त्रोत है।और भारत मे प्रकृति पूजा यहाँ की परंपरा रही है , सूर्य की पूजा किसी भी परम्परा से बहुत- बहुत पुरानी है। यह वैदिक काल से है। लेकिन आज सूर्य का मानवीकरण किया गया है। इसका आधार हमारा कृषि आधारित समाज है।

2- सूर्य देव की उपासना ही छठ पर्व से जुड़ा है और इसक वैज्ञानिक महत्व भी है। कहा जाता है कि अस्ताचलगामी और उगते सूर्य को अर्घ देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता और इंसान निरोगी रहता है।

3- सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभी सभ्यता में देखी जा सकती है। पौराणिक काल से ही सूर्य को आरोग्य के देवता माना गया है । वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य की किरणों में कई रोगों को समाप्त करने की क्षमता पाई गई है ।

4- सूर्य पूजा का महत्व इतना अधिक किसी पूजा में नहीं मिलता. इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी हैं। कहते हैं इस दिन धरती पर सूर्य की हानिकारक विकिरण आती हैं। इससे मनुष्य जाति को कोई प्रभाव न पड़े इसलिए नियमो में बाँधकर इस व्रत को संपन्न किया जाता हैं. इससे मनुष्य स्वस्थ रहता हैं।

5- छठ पूजाअपनी सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष के कारण महत्त्व रखता है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल तंबू कनातों की जरुरत है न ही मंदिरों की और न ही इसके मूर्तियों की। बिजली के लट्टुओं की चकाचौंध, पटाखों के धमाके और शोर शराबे से दूर है यह पर्व ।

6- इस पूजा में वही चीजें चढ़ेगीं जो किसान और खेतिहर जीवन में सर्वाधिक सुलभ और आम महत्व की है। गुड़, गन्ना, सिंघाड़ा, नारियल, नींबू, हल्दी, अदरक, सुपारी, साठी का चावल, जमीरी, संतरा, मूली और सामान्य फल फूल के अलावा गाय का दूध।

7- आम जीवन मे रोज प्रयुक्त की जाने वाली चीजे खरीदी जाती है जिनका वर्ष भर प्रयोग होता है। बाँस निर्मित सूप और दौरी या बड़ी टोकरी, मिट्टी के बरतन दिए, गन्ने की पहली फसल और गन्ने से बना नया गुड़, नया धान से निकला हुआ नया चावल और उसका लड्डू और भुना लाई, कुट्टी का आटा, और गेहूँ से निर्मित प्रसाद आदि ।

8- लोक जीवन मे गाये जाने वाले लोकगीतों से युक्त होकर यह लोक जीवन की भरपूर मिठास और नया रूप प्रदान करता है । शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में रगां हुए इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पंडित पुरोहित के विधि विधान की जरूरत पड़ती है ।

9- इस पर्व मे एक पडोसी और एक पड़ोस के साथ और उसकी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। और ख़ुशी से इस पर्व के पूर्णहुति मे सहयोग करता है जिससे लोक पक्ष मजबूत होता है।

10- इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। घर के आसपास की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबंधन, तालाव या नदी किनारे पूजा की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता।

11- इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक पास पड़ोस और समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिकता के भाव से किये गए कार्य और कर्म का विराट प्रदर्शन है।


गीतों में भइया से छठ पर पूजा की मोटरी लाने का और धरती की हरयाली और सघन करने का आग्रह भी है। परदेसी पति को याद दिलाया जाता है कि घर पर छठ होने वाला है और अपनी जमीन से उखड़ने के दर्द को उत्सवधर्मिता से मिटाने का प्रयास किया गया है। पूजा के लिए लाए पके केले को सुग्गा के जूठा कर देने का गुस्सा है। लेकिन मूर्छित सुग्गे को जीवन दान के लिए सूर्य देव से आराधना और बिनती भी है कि वह जल्दी उदित हों ताकि उन्हें अ‌र्घ्य दिया जा सके।



छठ पूजा की विधि:

चार दिन का यह पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। इसे उत्तर भारत में सबसे बड़ा त्यौहार भी माना जा सकता हैं। इस पर्व मे गंगा स्नान या स्थानीय नदी या तालाब का महत्व सबसे अधिक होता हैं। जिसमे खड़े होकर यह पूजा संपन्न की जाती है। पूजा मे छठ देवी जो कि सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है।

इस पूजा को घर की महिलायें एवम पुरुष दोनों करते हैं। पत्नी बीमार है तो पति ब्रत रहते है। इसमें स्वच्छ एवं नए कपड़े पहने जाते हैं जिसमे सिलाई न की गयी हो जैसे महिलायें साड़ी एवम पुरुष धोती पहन सकते हैं। इन चार दिनों में व्रत करने वाला धरती पर सोता हैं। जरुरत पर कम्बल या चटाई का प्रयोग कर सकता हैं।
इन दिनों घर में प्याज लहसन एवम माँस मंदिरा का प्रयोग वर्जित होता है और सामान्यता खाना घर से बाहर बनाता है । सामान्य घरो मे बाटी चोखा बनता दीखता है।

यह एक चार दिवसीय त्यौहार हैं

1- नहाय खाय का यह पहला दिन होता हैं। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता हैं। इस दिन सूर्य उदय के पूर्व पवित्र नदियों का स्नान किया जाता हैं इसके बाद ही भोजन लिया जाता हैं जिसमे कद्दू खाने का महत्व है।

2- लोहंडा और खरना यह दूसरा दिन होता हैं जो कार्तिक शुक्ल की पंचमी कहलाती है। इस दिन निराहार रहते हैं रात्रि में खिरनी खाई जाती हैं और प्रसाद के रूप में सभी घर वाले इसे ही खाते है। इस दिन आस पड़ौस एवं रिश्तेदारों को भी न्यौता दिया जाता हैं।

3- संध्या अर्घ्य यह तीसरा दिन होता हैं जिसे कार्तिक शुक्ल की षष्ठी कहते हैं। इस दिन संध्या में सूर्य पूजा कर ढलते सूर्य को जल चढ़ाया जाता हैं जिसके लिए किसी नदी अथवा तालाब के किनारे जाकर टोकरी एवम सुपड़े में देने की सामग्री ली जाती हैं एवम समूह में भगवान सूर्य देव को अर्ध्य दिया जाता हैं। इस समय दान का भी दिया जाता है। इस दिन घरों में प्रसाद बनाया जाता हैं जिसमे लड्डू का अहम् स्थान होता हैं।

4- उषा अर्घ्य का यह अंतिम और चौथा दिन  सप्तमी का दिन होता हैं। इस दिन उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता हैं एवम प्रसाद का वितरित किया जाता हैं।

यह चार दिवसीय व्रत बहुत कठिन साधना से किया जाता हैं जिसमे साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखते है। इसे हिन्दुओ का सबसे बड़ा व्रत कहा जा सकता  हैं। इस त्यौहार पर नदी एवम तालाब के तट पर मेला लगता हैं। इसमें छठ पूजा के गीत गाये जाते हैं। जहाँ प्रसाद वितरित किया जाता हैं। और लोग ख़ास तौर पर महिलाये बिना भेद भाव के प्रसाद अपने आँचल मे मांगती भी है।

कार्तिक छठ की तरह ही चैती अथवा चैत्री छठ मनाया जाता हैं. बस तिथी में अन्तर होता हैं. दोनों ही पूजा में सूर्य देव की पूजा की जाती है।

भगवान सूर्य हम सभी के जीवन मे प्रकाश भरे।

Tuesday, November 1, 2016

टूटते परिवार : कारण से निवारण तक


टूटते परिवार : कारण से निवारण तक


बीते दिवाली कले त्यौहार मे  मुझे लगा कि  आज कल त्यौहार मे  वो बात नहीं रही है जब एक दो दशक पहले किसी त्यौहार को मनाने  मे  संयुक्त परिवार के सभी साथ होकर कोई पर्व मनाते थे.फिर मैंने कुछ कारणों की तरफ ध्यान दिया तो बड़े ही अजीब से नजर आये। ..फिर सोचा क्यों न इसी पर कुछ लिखा जाए कि  क्यों आज संयुक्त परिवार टूट रहे है. क्यों अपने आज साथ नहीं है।

सर्वप्रथम आज प्रत्येक विचारशील व्यक्ति आधुनिकता को पारिवारिक संगठन के लिए एक संकट के रूप में
स्वीकार करने को तत्पर दिखाई देता है इस स्वीकारोक्ति की यथार्थता की जांच के लिए कुछ बुनियादी
प्रश्नों का विश्लेषण अपेक्षित है

क्या है आधुनिकता:

सरलतम शब्दों में समय के साथ चलने की मनोवृत्ति आधुनिकता है. इसके ठीक विपरीत समय के पीछे चलना रुढिवादिता है. इसलिए दोनों से बचते हुए आधुनिकता को अपनाने की सलाह दी जाती है. लेकिन यदि आधुनिकता को अपनाना ही उचित है तो किसी भी दृष्टि से संकट मारने का क्या कारण है और क्यों यह परिवार के लिये संकट का कारण बनती जा रही है.?

जरूरत है इसके विचार और व्यवहार दोनों पक्षों पर विचार किया जाए क्योंकि समस्याएं दोनों तरफ है .

आधुनिकता का अर्थ है समय के साथ चलना है यानि वर्तमान के साथ समायोजित होकर जीना है लेकिन यहां समय का वर्तमान के परिप्रेक्ष मे मूल्याङ्कन नितांत आवश्यक हो जाता है.

किसी भी सामाजिक परिप्रेक्ष्य की पहचान उसमें स्वीकृत जीवन मूल्यों से होती है. दरअसल संबंधित जीवन मूल्यों के आलोक में ही किसी भी सामाजिकता को उचित रूप से परिभाषित किया जा सकता है.प्रश्न है कि जीवन मूल्य क्या है?

जीवन मूल्य दरअसल जीवन और जगत के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण से निकले होते हैं. यही कारण है कि सामाजिक गतिशीलता को उर्ध्वगामी बनाए रखने के लिए जीवन मूल्यों के प्रति सजकता और उनका स्पष्ट बोध बहुत ही आवश्यक है. जीवन दर्शन और उस पर आधारित जीवन मूल्य किसी समाज की अपेक्षाओं का निर्धारण करते हैं जिसकी पूर्ति हेतु वह समाज विभिन्न आविष्कारों को संभव बनाता है और इनका उपयोग कर अपने आवश्यकताओं को शांत करता है. यदि सब कुछ सामंजस्यपूर्ण होता रहा तो मानव जीवन विकास पथ पर आगे बढ़ता रहेगा.

आज संपूर्ण विश्व मूल्यों के सन्दर्भ मे भ्रम का शिकार है परिणाम स्वरुप समाज में जीवन दर्शन,जीवन मूल्य, अपेक्षा,आविष्कार तथा उनके उपभोग के बीच समन्यव समाप्त होता जा रहा है. यह वास्तव मे आदर्श और व्यवहार के बीच की खाई है जो बढती ही जा रही है. यह सत्य है कि जीवन दर्शन की स्पष्ट अवधारणा प्रत्येक व्यक्ति को नहीं होती है लेकिन जीवन मूल्यों का बोध और उनके प्रति संपूर्ण निष्ठा सामाजिक गतिशीलता की अनिवार्य शर्त है. इसके संबंध में भी भ्रम की स्थिति जीवन की साम्यावस्था को भंग कर सामाजिक गतिशीलता को दिशाहीन कर देती है . मानव जीवन को अशांत कर देती है. पूरे विश्व में यही हो रहा है ।

मूल्यात्मक बिभ्रम के कारण आज मनुष्य अपने आवश्यकताओं को समझने में भूल कर बैठा है . उसके समक्ष अनावश्यक आवश्यकतयों का एक पहाड़ सा खड़ा हो गया है. यदि आवश्यकता है तो वो मनुष्य की नकारात्मक उर्जा से प्रेरित है. इसी कारण मनुष्य के द्वारा अपनी उर्जा का सृजनात्मक प्रयोग न करके विलासता के लेकर विनाश तक के संसाधनों का आविष्कार किया गया है.

दिशाहीन अविष्कारों की बहुलता उपभोक्तावादी संस्कृति और गला काट व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है,वास्तव मे ये सब एक सिक्के के ही पहलू हैं और एक ही साथ चलते हैं और एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं. वर्तमान समय भी इसी ताने बाने से उलझा हुआ है .

उपभोक्तावाद का सर्वाधिक दुष्प्रभाव व्यक्तिगत चरित्र और पारिवारिक संरचना के ऊपर सर्वाधिक पड़ा है । ऐसे मे टूटन का दंश भी ये ही ज्यादे झेल रहे है।

1- पहले खेती का कार्य होता था. सभी लोग एक ही कार्य को खेत में मिलकर सामान रूप से मेहनत से करते थे। इसलिए परिवार मे मत- भेद तो होते थे लेकिन मन-भेद नहीं हो पाता था। आज एक परिवार के दो भाई भिन्न-भिन्न नौकरी कर रहे हैं, अलग-अलग मासिक आय और अलग अलग स्टेटस और रहन सहन आपस में जलन पैदा कर रही है । फलतः बढ़ते वैमनस्य से लोग अलगाव की तरफ अग्रसर हो रहे हैं।

2- आजीविका यानि नौकरी का का अलग शहर में होना भी लोगों को परिवारिक बिखराव का कारण बन रहा है। बढती जरूरतोंके साथ के साथ आज बच्चे शादी से पूर्व शिक्षण हेतु दुसरे शहर अथवा विदेश में होने के कारण घर से दूर होस्टल आदि में रह रहे हैं। ऐसी स्थिति में भी माता-पिता अकेले हो रहे हैं। इसके बाद नौकरी करना भी इसको और विस्तार देता है।

3- आज के उपभोक्तावाद के कारण प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक उपभोग की सामग्री एकत्र करने में व्यस्त हो रहा है और पूरा समाज इसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है. हर एक व्यक्ति यही सोच रहा है कि उपभोग युक्त सामग्री का अधिकाधिक संग्रह वह कैसे करें, इस प्रतिस्पर्धा में सभी मानवीय कर्तव्य और सामाजिक संबंध तथा मर्यादाएं टूटती जा रही. किसी को किसी और की ओर देखने की फुर्सत नहीं है. व्यक्ति व्यक्ति से कटता जा रहा है. पारस्परिक सहयोग मे निःस्वार्थ परोपकार का समापन होता जा रहा है.

4- आज व्यक्ति शुद्ध रूप से एक व्यवसाय तथा आर्थिक संस्था संस्था का रूप लेता जा रहा है. बात यहीं तक होती तो गनीमत थी लेकिन अर्थ एवं उपभोक्ता सामग्री की उपार्जन की अधिकतम लालसा के कारण व्यक्ति व्यक्तिगत और अपराधी प्रवृति का होता जा रहा है. उपभोग की सामग्री जुटाने के लिए व्यक्ति हर तरह का मार्ग अपनाने लगा है. उसे सही और गलत का पता तो है लेकिन वह उसे नजरअंदाज करने में लगा हुआ है. उपभोक्तावाद ने भोग की इच्छा को बढ़ाया है और बढ़ी हुई इच्छा ने मनुष्य की आवश्यकता को और बढाया है. और जब आवश्यकतायें बढ़ी है तो लोगों में इसे किसी भी तरीके से पूर्ण करने की भावना जागी है, यही हो रहा है और सारा खेल इसी मानसिकता की देन है

5- उपभोक्तावाद जन्य आवश्यक आवश्यकताओं के अंबार ने व्यक्तिगत चरित्र के पतन के साथ-साथ व्यक्ति को खुद में सिमटने के लिए बाध्य कर दिया है. उसके भीतर प्रेम और सहयोग के उन मौलिक आधारों का समापन हो रहा है जो कि परिवार बोध तथा मनुष्यता के आधारभूत संरचनात्मक घटक रहे है. परिणाम यह है कि परिवार जैसी नैसर्गिक संस्था मे दरार पैदा हो रही है. दूसरी ओर मनुष्य संकुचित व्यक्ति की आत्म विरोधी विशेषता से युक्त होकर अपना ही मूल्य होता जा रहा है. आज जिस परिवार ने उपभोक्तावादी मानसिकता को पूरी तरह अपना लिया उसमें वैक्तिक संबंध अपनी नैसर्गिक भावनात्मकता के मूल से कटकर व्यवसायिक बन गए है और संबंधो में भावनात्मकता समाप्त हो गई है.

6- आज संसाधनों के संग्रह तथा उनके उपभोग मे मनुष्य इतना व्यस्त हो गया है कि किसी भी संबंध को बोध समझ लेना उसके लिए आसान हो गया है. व्यक्तिगत आवश्यकता और उनकी पूर्ति के लोभ में व्यक्ति कितना असहाय हो चुका है कि उसके पास किसी भी संबंध को नैसर्गिक अर्थ में जीने के लिए समय ही नहीं रह गया है, पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई, भाई-बहन जैसे आज सारे संबंध अपनी स्वाभाविकता खो रहे हैं और भार बनने की राह पर अग्रसर है,यानि जिन आधारों पर पारिवारिक ढाचे को विकसित होता है वो टूटते जा रहे हैं ऐसी स्थिति में पारिवारिक ढांचे में बिखराव होना निश्चित है.

7- आज आवश्यकता आविष्कार की जननी नहीं रह गयी है । बल्कि आविष्कार ही आवश्यकता का जनक बन गये है। बाजार की समस्या यह है कि जो उत्पादन हो चुका है उसका उपभोग कैसे किया जाए ताकि उसका अधिक से अधिक लाभ मिले। मनुष्य की सोच यह हो गयी है कि अगर संतुष्टि न मिले तो कुछ और उपभोग की वस्तु खरीदी जाए। इस क्रम मे जल्द ही चीजो से ऊबन होने लगती है यही क्रम संबंधों मे भी उभर कर आने लगा है ।
किसी भी प्रकार तृप्ति की तलाश में पूरे विश्व के मनुष्यों को इधर-उधर विस्थापन करने के लिए मजबूर किया है। और समस्या यह है कि वह इसी की आड़ मे पाशविकता के धरातल पर भी उतरता जा रहा हैं और संबंधों में हिंसा का उभार आया हूं ।और हिंसा किसी भी प्रकार के मानवीय संबंध के लिए घातक होती है।

8- परिवार का मूल है प्रेम, परोपकार, सहयोग. धीरे-धीरे यह तत्व परिवार से गायब होते जा रहे हैं क्योंकि भागदौड़ और तनाव की दशा में व्यक्तियों से यह चीजे समाप्त होती जा रही है. ऐसे में परिवार की संस्थाएं घुटन की ओर अग्रसर हैं । घुटन से एक बेचैनी , एक असंतोष पैदा होता है जहां पर व्यक्ति नए नए संबंधों के सृजन में व्यस्त है आपसी सहमति के आधार पर अधिक तृप्ति की आशा लिए व्यक्ति इधर उधर भटकता रहता है। भटकाव बिघटन का भी कारण है।

9- एक आदर्श समाज और एक आदर्श परिवार और एक आदर्श सम्बन्ध की तलाश में व्यक्ति मानवीय संबंधों से कटता जा रहा है । ऐसे में वह आदर्श के पास जाने की उत्कंठा लिए हुए वह वर्चुअल दुनिया में एक नए प्रकार के समाजिक संबंधों की रचना कर रहा है । मानवीय संबंधों का सबसे बड़ा आधार यह है कि कोई स्वीकार करें, उसको प्यार करें लेकिन आज यह तत्व धीरे धीरे समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में व्यक्ति आदर्श प्यार और आदर्श संबंध की खोज मे नित नए-नए व्यक्तियों से जुड़ने का प्रयास् कर रहा है और पुराने संबंधों को तोड़ता जा रहा है चाहे यह रिश्ता माता-पिता से हो या पत्नी से, दोस्तों से। इसके पीछे वह भौतिकवादी सोच है जो की संबंधों मे भी ऊबन पैदा कर रही है।


10- आज घरों मनोरंजन के विकल्प इतने ज्यादा हो गए हैं की लोगों की एक दुसरे पर निर्भरता कम हो गयी है , लोग किसी के साथ उठ बैठ कर अनेक गेम खेलते थे और जो ख़ुशी हासिल करते थे उसको आज उन्होंने टीवी, कम्पूटर , विडिओ गेम्स आदि में ढूंढ ली है। ये सारे व्यक्तिगत मनोरंजन के साधन है . इन्टरनेट ने इसको और विस्तार दिया है . इसलिए मनुष्य के लिए मनुष्य की उपयोगिता कम और वैज्ञानिक तकनीकों पर निर्भरता बढ़ गयी है।

11- सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी परिवारों को बिखेरने मे आज एक अहम् रोल निभा रहा है।आज लोग प्यार, विश्वास, भावनाओं आपस मे बाटने के बजाये वर्चुअल दुनिया के लोंगो मे बाँट रहे है जिनको कभी देखा नहीं है। जरा सोचिए हम मोबाइल या चैट मे दूसरे से बात मे कैसी भाषा और शब्दों का प्रयोग करते है और घर मे अपनों से कैसी भाषा और शब्दों का use करते है। और शायद यही कारण है कि जिस तकनीक ने ग्लोबल मे लोगों को एक-दूसरे के बहुत पास ला दिया है, उसी तकनीक आपस के लोंगो संबंधों मे / रिश्तों में खटास भी पैदा की है। आपसी संपर्क तेजी से टूट रहे हैं।

12- आज इंसानों का मशीनीकरण होता जा रहा है। वो इंसान कम रोबोट ज्यादा हो रहे हैं। घर माता पिता से दो महीने से भी बात नहीं की या उनसे दूर हैं तो चलेगा, लेकिन नेट कनेक्शन आधे घंटे भी नहीं मिला तो छटपटाने लगेंगे। और पूरा दिन खुद मे खोये रहते है मसलन आज लोंगो को अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए समय नहीं है। आमने सामने मिलना खत्म होता जा रहा है इसकी जगह फोन, इंटरनेट संपर्क साधने के साधन माध्यम और यंत्र बनते जा रहे हैं। अब तो किसी की मृत्यु होने का समाचार और विवाह की सुचना भी लोग ईमेल और sms से दिए जा रहे हैं। जो कि की मानवीय संबंधों के लिए घातक हो रहे है।

13- वर्चुअल दुनिया ने आज लोंगो को वास्तविक दुनिया और इसके वास्तविक रिश्तों से किनारा कर लेने को प्रेरित किया है। आज पर्सनल लाइफ भी सार्वजनिक होती जा रही है । परिवार जैसे शब्दों ने फेसबुक, वॉट्सएप से जुड़ कर एक समूह के रूप मे facebook परिवार और whats app परिवार का रूप लेना शुरु कर दिया है ऐसे मे आपसी रिश्तों में दरार आने से पारिवारिक भी रिश्ते भी टूट रहे हैं।

14- तकनीक भी अब तलाक का कारण बनती जा रही है। कई केस में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर डाली गई फोटो, कमेंट्स, लाइक्स आदि भी शक और दूरी बढऩे का कारण साबित होते हैं। पल मे गुस्सा का भाव होते ही पल भर मे सूचनाओं का आदान-प्रदान ग्लोबल परिवार मे हो जाटा है . ऐसे मे रिश्ते अपना मूल्य खोते जा रहे है और लोंगो मे इससे जन्में संदेह से आपसी प्यार और संवेदना समाप्त हो रहे हैं। मसलन जो नवविवाहित हैं, शिक्षित हैं उनमें तलाक के मामले ज्यादा दिखाई दे रहे है.

15- अक्सर देखा गया है कि किसी परिवार मे यदि दो भाई हैं, तो माएं दोनों को बराबर प्यार करती हैं , लेकिन सास बनने के बाद दोनों बहुओं पर सम भाव नहीं रह पाता है ऐसे मे , एक को बहुत मान मिलता है तो दूसरे को तिरस्कृत होना पड़ता है. जिसके कारण रोगग्रस्त आधा हिस्सा अलग होने के लिए मजबूर हो जाता है।

16- परिवार में लोग एक- दूसरे के प्रति हमारा क्या कर्त्तव्य और दायित्व के बजाये अधिकारो की बात करने लगे है । छोटों के प्रति बड़ों का क्या उत्तरदायित्व होता है और बड़ो का अपने छोटों के प्रति निष्पक्ष व्यवहार और निर्णय आदि भी पारिवारिक न्याय का मुद्दा बनते जा रहे है ।इस प्रकार परिवार मे bios उत्पन्न हो रहा है जो कि टूटन का एक महत्वपूर्ण कारण बनते जा रहे है।

17- परिवार का मूल है समर्पण । लेकिन आज बहुत छोटी- छोटी बातों को तूल देने, व्यक्तिगत अहंकार, हेकड़ी, भावनात्मक असंतुलन, अविश्वास के कारण परिवार का मूल तत्व खत्म होता जा रहा है। और ये भी एक कारण है कि घर परिवार का टूटन हो रहा है। शिक्षित पति- पत्नियों में आपसी मनमुटाव आज एक नए रूप मे दिख रहा है और नव विवाहित लड़कियों और नए परिवार सदस्यों से तो उनका तालमेल न बैठना एक आम बात होकर रह गई है। मैं और मेरा पति और उसकी कमाई की भावना आज टूटन का कारण बनती जा रही है। पति, पत्नी और इनके परिवार का ‘अहं’ काम करता है, आपसी बातचीत की कमी और समस्या को समस्या न समझने के कारण दोनों पक्ष इसी वहम में रहते हैं कि समस्या अपने आप सुलझ जायेगी जबकि ऐसा कभी नहीं होता। और धीरे धीरे समस्या इतना विकराल हो जाती है कि परिवार तो टूटता ही है धन-जन की भी क्षति होती है

18- पाश्चात्य संस्कृति में नवीन संबंधों की स्थापना और पुराने संबंधों के बिखराव को एक सामाजिक मान्यता मिली हुई है। यह सब कुछ आपसी सहमति के आधार पर अधिक तृप्ति की खोज की आशा में होता है । दूसरे शब्दों में पाश्चात्य संस्कृति की अपनी जीवन दृष्टि है , अपने जीवन मूल्य हैं और अपना एक पारिवारिक ढांचा है। जिसके लिए वहाँ के लोग अभ्यस्त हैं। वहां पर पारिवारिक सदस्यों में आपकी अपेक्षाएं भी अलग है इसलिए पारिवारिक विघटन किसी भी प्रकार तनाव बोध का कारण नहीं बनता है। इस तथ्य ने एक गतिशील परिवारिक बोध का स्वरुप धारण कर लिया है जिसे लोंगो ने स्वीकार भी कर लिया है।लेकिन भारतीय संस्कृति में इनका विकास अभी नहीं हो पाया है इसलिए यहां पर टूटन का दंश भी ज्यादे हैं।

19- धर्म और शिक्षा व्यक्ति को विनम्र बनाती है। धार्मिक व्यक्ति जहां सभी के विचारों का सम्मान करना जानते है वहीं वह अपने रूठों को मनाना भी जानते है। ऐसेपरिवार मे में प्रेम और सहयोग का भाव रहता है । परिवार के सदस्यो को मनाना और बीच का एक रास्ता निकलना एक कला है दुर्भाग्य से आज इसका अभाव हो रहा है।

20- महिलाएं आज आर्थिक रूप से शसक्त हो गयी है ऐसे मे सास बनने की स्थिति में वो किसी प्रकार से दबना नहीं चाहती । घर मे थोड़ी सी मतभेद अवस्था उनको अपने बेटे बहु से अलग रहने का निर्णय लेने को प्रेरित कर रही हैं। किसी के निर्देश या आदेश स्वीकार न करना और अलग रहना के पीछे का कारण है उनकी आर्थिक स्वतन्त्रता और व्यक्तिगत आजादी । ज्यादा आर्थिक सहयोग और बदले मे ज्यादा प्राप्ति की इच्छा इसका मूल है।

21- वैचारिक भिन्नता और कुंठा अलगाव का कारण बनती है। अक्सर पुरुष बिना कोई गलती के अपनी सत्ता मनवाने के लिए महिलाओं पर जोर जबरदस्ती करता है, जिसका परिणाम कही कही पर पारिवारिक महिला सदस्यों का मानसिक और शारीरिक हिंसा के रूप मे दिखाई देता है । परिवार टूट रहे है इसका बड़ा कारण गृह कलह भी है चुकि सामान्यतया दो इंसानों की सोच एक नहीं होती है इस सोच को एक करने के लिए किसी साधन माध्यम या यंत्र की जरूरत होती है और वह निश्चित रूप से धर्म और या समाज है। इसका अभाव भी टूटन का एक कारण है।

22- महिलाएं हमारे सदियों पुरानी समाज के पितृसत्तात्मक पद्धति को चुनौती देती हुई अपने अहंकार के कारण पति के महत्व ही भूल जाती हैं। फलतः वे अपनी परिवार के विखराव को नहीं रोक पातीं है।

23- पति के द्वारा किसी प्रकार का नशा या व्यसन का सेवन का किया जाना भी पारिवारिक हिंसा का कारण बनता है शादी के पूर्व भी ऐसे बातों का शेयर न किया अचानक पारिवारिक टूटन का कारण बनता दिख रहा है।




निष्कर्ष- कारणों को जानकर हम प्रभाव का मूल्याङ्कन कर सकते है। और कारण के निवारण से प्रभाव का निवारण भी किया जा सकता है।

टूटन के कारणों की सूची व्यक्तिगत हो सकती है इस कारण और लंबी हो सकती है । यहाँ कुछ आधारभूत बातो को ढूढने का प्रयास  किया गया है।

सबके के मूल मे यह तथ्य है मनुष्य हम होते है मानव हमें होना होता है ऐसे मे जब हम मानवीय गुणों का आत्मसात करते जायेंगे तो देवत्व की और अग्रसर होते रहेंगे और problom भी कम होती जाएगी।   इसी के साथ आप सभी की जय हो ..विजय हो ...मंगल हो...

Sunday, October 23, 2016

दीपावली: पाँच पर्वो का पुंज

दीपावली : पाँच पर्वो का पुंज

त्योहार या उत्सव हमारे सुख आनंद और हर्षोल्लास के प्रतीक है जो परिस्थिति के अनुसार अपने रंग-रुप और आकार में भिन्न होते हैं। त्योहार मनाने के तरीके भिन्न भिन्न हो सकते है किंतु इनका मूल अभिप्राय आनंद और  ऊर्जा प्राप्ति ही होता है।

लगभग सभी त्योहारों का कोई न कोई पौराणिक महत्व है जिनका अधिकतर भाग आस्था से जुड़ा होता है। यह संभव हो पौराणिक कथाएं प्रतीकात्मक महत्व की हो क्यों कि इनका मकसद सामाजिक व्यवस्था का नियमन एवं संचालन होता है।

कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इसे दीवाली भी कहते है।

वास्तव मे दीवाली सिर्फ एक दिन का त्योहार न होकर, त्योहारों की एक श्रृंखला है। जिसके साथ पांच पर्वों जुड़े हैं। जो कि दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।

सभी पर्वों की अलग अलग धार्मिक, पौराणिक महत्त्व है ।जिसके पीछे अलग अलग दंत-कथाएं भी है ।

भारत में दीपावाली त्यौहार का महत्व

1- हिन्दू मान्यता के अनुसार दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास को खत्म कर घर लौटे थे। अपने प्रिय राजा के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए थे। तब से लेकर आज तक यह प्रकाश-पर्व के रूप मे भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है।

2- भारतीय परंपरा मे ये मान्यता है कि सत्य की सदा जीत होती है। दीपावली का वास्तविक भाव भी यही है ।
असतो मा सद्गगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय। इस प्रकार दीपावली व्यक्ति को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व है। आज भी प्रत्येक दीपावली के दिन एक दीपक से ही दूसरा दीपक जलाया जाता है और इन दीपों से निकलने वाला यह प्रकाश सदियों  से व्यक्ति और उसके समाज को शांति व भाइचारे का संदेश देता आ रही है।  दिवाली अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन लोग आपसी दुश्मनी दूर करने और प्यार और दोस्ती को बढाने के लिये इस दिन मिठाई और उपहार वितरित करते है।


3- कृष्णपंथ के मतानुयायी मानते है कि इस दिन द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण ने चतुर्दशी (दिवाली से एक दिन पहले) को बुराई के प्रतीक राक्षस नरकासुर के ऊपर विजय की थी जिसके उपलक्ष्य में दिवाली को मनाया जाता है।

4- यह पांडवो के 12 वर्ष के निष्कासन के साथ साथ 1 वर्ष के अज्ञातवास अर्थात् छुप कर रहना से वापस घर आने के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है।

5- एक पौराणिक मान्यता के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था

6- जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने 527 ई0पू0 मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति किया था जिसके उपलक्ष्य में यह पर्व मनाया जाता है, और आर्य समाजवादियों द्वारा महावीर स्वामी की मृत्यु की वर्षगांठ या शरदीया नव-शयष्टी के रुप में मनाया जाता है।

7- सिक्ख धर्म मे भी अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और इस दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द जी को जेल से रिहा किया गया था।

8- हिन्दू कलैण्डर के अनुसार दिवाली (अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष का अन्तिम दिन) पर मारवाङी अपना नया साल मनाते है।

9- गुजराती भी चन्द्र कलैण्डर (कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष के पहले दिन) के अनुसार दिवाली से एक दिन बाद अपना नया साल मनाते है।


10- आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दीपावली बंधनसे मुक्ति का दिन है। व्यक्ति के अंदर अज्ञानरूप अंधकार का साम्राज्य है। दीपक को आत्म ज्योति का प्रतीक भी माना जाता है। अतः दीप जलाने का तात्पर्य है- अपने अंतर को ज्ञान के प्रकाश से भर लेना, जिससे हृदय और मन जगमगा उठे। इस दिन चतुर्दिक तमस् में ज्योति की आभा फैलती एवं बिखरती है। अंधकार से सतत् प्रकाश की ओर बढ़ते रहना ही इस महापर्व की प्रेरणा है। इसलिए सभी स्थानों पर सरसो के तेल के दीयें जलाने से बुरी ऊर्जा जल कर नष्ट होगी और अच्छी ऊर्जा आकर्षित होगी। इस प्रकार आध्यात्मिकता की दृष्टि से यह जागरूकता और भीतर के प्रकाश के जश्न का त्यौहार है।

शुद्ध आत्मा, समृद्धि और भगवान के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिये अपने अंदर और बाहर जैसे घरों, कार्यालयों और अन्य काम के स्थानों की साफ सफाई और रंगरोगन का त्यौहार है। साल भर की गन्दगी की घर से बाहर निकलने से नकारात्मक ऊर्जा की समाप्ति के साथ सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

बुराई को दूर करने के लिए लोग बहुत तेज ध्वनि करते है और हर जगह रोशनी का प्रयोग करने है इसका अपना एक विशेष महत्व है।

लोग पूरे वर्ष के लिए अच्छा स्वास्थ्य, धन, ज्ञान, शांति, समृद्धि प्राप्त करने के मिथक में पटाखों का प्रयोग करते है। इनका प्रयोग से उच्च श्रेणी विभिन्न फ्रीकेन्सी की ध्वनि निकलती है जो कि लोगों की असली खुशी का संकेत है। दूसरी ओर पटाखों से निकला धूआ बरसात के मौसम के बाद उत्पन्न हुये बहुत से कीडों को मारता है। लेकिन आज यह तेज आवाज और खतरनाक पटाखों का उत्सव बनता जा रहा है लेकिन दिवाली पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का पर्व नहीं है।

लेकिन दीवाली त्योहार का मतलब सिर्फ पटाखा फोड़ना नहीं होता है। जरा सोचिए पटाखों के कारण कितने दमें के मरीज खाँसते-खाँसते बीमार हो जाते है । कितने ही घरों में आग लग जाती है और कितने लोग पटाखों के कारण घायल और मृत हो जाते है।

वास्तव  मे  दिवाली पर्व है प्रकाश का । यह पर्व समाज से अंधकार को समाप्त कर उल्लास, भाईचारे व प्रेम का संदेश फैलाने की प्रेरणा देता है न कि खतरनाक पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का। यह पर्व है साफसफाई और घरों को सजाने का । लोग अपने घर और ह्रदय को  आशीर्वाद, बुद्धि और धन का स्वागत करने के लिये गन्दगी बाहर निकलते है।  सजाते है.  रंगोली बनाते है, दरवाजे पर पर्दे लगाते है, इस दिन देवी लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा करते है।

11- दीवाली का पर्व लक्ष्मी जयंती का पर्व भी है। कमला जयंती, लक्ष्मी जयंती के लिये भी प्रसिद्ध है। लक्ष्मी का संबंध सुख, संपत्ति, समृद्धि, वैभव आदि से है।

दीपावली का सीधा संबंध लक्ष्मी पूजा के रूप में है। समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकले थे, जिनमें पहले रत्न लक्ष्मी अर्थात् ‘श्री’ के प्रकट होने की कहानी है ।पौराणिक महत्व के साथ यह एक व्यावहारिक सच्चाई भी है कि लक्ष्मी की प्रसन्नता सभी के लिए अभीष्ट है। धन वैभव हर किसी को चाहिए। इसलिए उसी अधिष्ठात्री शक्ति की पूजा-आराधना के लिए दीपावली का महापर्व व्यापक रूप से प्रचलित है।

व्यापारी वर्ग दीवाली की प्रतीक्षा में पूरा वर्ष लगा देता है ऐसी मान्यता है कि यदि दीवाली अच्छी हो जाए, तो वह पूरे साल के लिए अच्छे आने का संकेत भी बन जाती है

साथ ही इसका सम्बन्ध व्यापार से भी है। भारत के व्यापारी इसी दिन धन की देवी लक्ष्मी जी का आह्वान करते हुए नए "बही खाते" की शुरुआत करते हैं। इस प्रकार दीवाली से नये व्यापार प्रारम्भ की शुरुआत भी होती है।  यह हर आदमी में, हर तरह से, नये उत्साह का संचार भी करती है।

12- दीवाली पर्व का जिक्र तंत्र ग्रंथों में मिलता है। यह पर्व खास तौर से तांत्रिकों, शक्तियों के अर्जन का पर्व है। दस महाविद्याओं में लक्ष्मी पूजन का जिक्र है। इसलिए दीवाली का पर्व शाक्तों का पर्व भी कहा जाता है। शाक्त वे लोग होते हैं, जो मूलतः शक्ति के उपासक होते हैं। वे शक्ति की पूजा कर के अपनी अंतर्निहित शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं।

13- यह पर्व ज्ञान, विवेक एवं मित्रता की लौ जलाने का भी पर्व है । दक्षिण भारत की परंपरा में दीवाली उत्सव की ऐसी मान्यता है ।

हिंदू पुराणों के अनुसार राजा बली एक दयालु दैत्यराज था। वह इतना शक्तिशाली था कि वह स्वर्ग के देवताओं व उनके राज्य के लिए खतरा बन गया। बली की ताकत को खत्म करने के लिए ही भगवान विष्णु एक बौने भिक्षुक ब्राह्मण के रूप में चतुराई से राजा बली से तीन पग के बराबर भूमि मांगी। राजा बली ने खुशी के साथ यह दान दे दिया। राजा बली को कपट से फंसाने के बाद जब भगवान विष्णु ने स्वयं को प्रभु के स्वरूप में पूर्ण वैभव के साथ प्रकट करते हुए अपने पहले पैर से ‘स्वर्ग' व दूसरे पग से ‘पृथ्वी' को नाप लिया तब राजा बली को वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने आत्म समर्पण करते हुए अपना शीश अर्पित करते हुए भगवान विष्णु को अपना तीसरा पग उस पर रखने के लिए आमंत्रित किया। भगवान विष्णु ने अपने अगले पग से उसे अधोलोक में धकेल दिया लेकिन इसके बदले में भगवान विष्णु ने राजा बली को समाज से अंधकार को दूर करने के लिए उसे ज्ञान का दीपक प्रदान किया। उन्होंने उसे यह आशीर्वाद भी दिया कि वह वर्ष में एक बार अपनी जनता के पास अपने एक दीपक से लाखों दीपक जलाने के लिए आएगा ताकि दीपावली की अंधेरी रात से अज्ञान, लोभ, ईर्ष्या, कामना, क्रोध, अहंकार और आलस्य के अंधकार को दूर करते हुए सभी में ज्ञान, विवेक और मित्रता की लौ जलाई जा सके।

 14-  दिवाली पर जुआ खेलने के रिवाज का भी महत्व है। लोगो को विश्वास है कि इस दिन देवी पार्वती और भगवान शिव ने जुआ पासों से खेले थे। इसी मिथक के साथ पूरे वर्ष समृद्धि पाने के लिये दिवाली की रात इस खेल को खेलते है।

पाँच पर्व का महत्त्व

1- धनतेरस

दीपावली रूपी  महापर्व आरम्भ स्वास्थ्य चेतना जगाने के साथ शुरू होता है। दीवाली का शुभारंभ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होता है। इसे धनतेरस कहा जाता है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि की आराधना की जाती है। वस्तुतः यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है।

महर्षि धन्वंतरी को आयुर्वेद व स्वस्थ जीवन प्रदान करने वाले देवता के रूप में भी पूजनीय है, जैसे धन-वैभव के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं, उसी प्रकार स्वस्थ जीवन के लिए स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरी की आराधना की जाती है।

धनतेरस की सायंकाल को यमदेव निमित्त दीपदान किया जाता है। ऐसा करने से यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। मान्यता है कि यदि गृहलक्ष्मी इस दिन दीपदान करें तो पूरे परिवार को रोग-मुक्ति मिलती है और पूरा परिवार स्वस्थ रहता है।

इस दिन पीतल और चाँदी खरीदने चाहिए। पीतल भगवान धन्वंतरी की धातु है। पीतल खरीदने से घर में आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।इस दिन चांदी खरीदने की भी परंपरा है। चांदी को चन्द्रमा का प्रतीक मानते हैं जो शीतलता प्रदान करती है जिससे मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। चाँदी कुबेर की धातु है। इस दिन चाँदी खरीदने से घर में यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और संपदा में वृद्धि होती है।

व्यापारी वर्ग इस दिन नए बहीखाते खरीदता है और इन्हें गद्दी पर स्थापित करते है। तत्पश्चात दिवाली पर इनका पूजन किया जाता है। इस प्रकार देवी लक्ष्मीजी के आह्वान का भी यही दिन होता है।

देवताओं के वैद्य माने जाने वाले धन्वन्तरि, चिकित्सा के भी देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए भी धनतेरस का विशेष महत्व है।

आयुर्वेद चिकित्सक अपने चिकित्सालय पर धनतेरस के दिन धन्वंतरी देव की विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। पुरातनकाल से अधिकांश आयुर्वेदिक औषधियों का इसी दिन निर्माण और अभिमंत्रित करने का भी प्रचलन है।

धार्मिक व पौराणिक मान्यता यह है कि सागर मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश के साथ अवतरित हुए थे और इस घटना के प्रतीक स्वरूप ही बर्तन खरीदने की परम्परा का प्रचलन हुआ। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन चल या अचल संपत्ति खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है।

पौराणिक मान्यता यह है कि माँ लक्ष्मी को विष्णु जी का श्राप दिया था कि उन्हें 13 वर्षों तक किसान के घर में रहना होगा। श्राप के दौरान किसान का घर धनसंपदा से भर गया। लेकिन श्राप से मुक्ति के उपरांत जब विष्णुजी लक्ष्मी को लेने आए तब किसान ने उन्हें रोकना चाहा। लक्ष्मीजी ने कहा कल त्रयोदशी है तुम साफ-सफाई करना, दीप जलाना और मेरा आह्वान करना। किसान ने ऐसा ही किया और लक्ष्मी की फिर से कृपा प्राप्त हुई । तभी से लक्ष्मी पूजन की प्रथा का प्रचलन आरंभ हुआ।

धन तेरस के दिनखेती करने वाले किसान धनिये के बीज खरीदते हैं। दिवाली के बाद इन बीजों को वे अपने खेतों में बो देते हैं। ग्रामीण इलाकों में इस दिन  लोग अपने पशुओं की पूजा करते हैं क्यों की यह आजीविका चलाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन मानते परंपरागत काल मे थे।

धनतेरस की सांय घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जला कर देवी लक्ष्मी का आह्वान करते है और इसी के साथ दीपावली का शुभारंभ होता है। दिवाली के पहले दिन का संबंध धन वैभव और सम्पदा से जोड़ा गया है।

2- नरक चतुर्दशी

दूसरे दिन चतुर्दशी को नरक-चौदस मनाया जाता है। इसे छोटी दीवाली भी कहा जाता है। इस दिन एक पुराने दीपक में सरसों का तेल व पाँच अन्न के दाने डाल कर इसे घर की नाली ओर जलाकर रखा जाता है। यह दीपक यम दीपक कहलाता है।

इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करना चाहिए और उसके बाद भगवन विष्णु और कृष्ण के दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।अर्थात यह दिन अपने रूप-रंग को संवारने की भी मान्यता लिए है।

इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं.

इसके पीछे एक पौराणिक कथा हैं ।


एक प्रतापी राजा थे जिनका नाम रन्ति देव था । स्वभाव से बहुत ही शांत एवम पुण्य आत्मा, इन्होने कभी भी गलती से भी किसी का अहित नहीं किया । अपनी मृत्यु के समय जब इन्होंने यम दूत को देखा तो इन्हें पता चला कि इन्हें मोक्ष नहीं बल्कि नरक मिला हैं । तब उन्होंने पूछा कि जब मैंने कोई पाप नहीं किया तो मुझे नरक क्यूँ भोगना पड़ रहा हैं । उन्होंने यमदूतों से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया एक बार अज्ञानवश आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा चला गया था | उसी के कारण आपका नरक योग हैं । तब राजा रन्ति से हाथ जोड़कर यमराज से कुछ समय देने को कहा ताकि वे अपनी करनी सुधार सके ।उनके अच्छे आचरण के कारण उन्हें यह मौका मिला। तब राजा रन्ति ने अपने गुरु के पास गए । गुरु ने उन्हें सलाह दी कि वे हजार ब्राह्मणों को भोज कराये और उनसे क्षमा मांगे । उनके इस कार्य से सभी ब्राह्मण प्रसन्न हुए और उनके आशीर्वाद के फल से रन्ति देव को मोक्ष मिला ।वह दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस का था, इसलिए इस दिन को नरक निवारण चतुर्दशी कहते है।

नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। पौराणिक कहानी के अनुसार एक हिरण्यगर्भ नामक एक राजा थे जिन्होंने अपना राज पाठ छोड़कर तप में अपना जीवन व्यतीत करने का निर्णय किया । उन्होंने कई वर्षो तक जंगल मे तपस्या की, लेकिन उनके शरीर पर कीड़े लग गए और शरीर काले और सड़ गया सा दिखने लगा। जिसके कारण राजा बहुत दुःख थे उन्होंने इससे निजात पाने के लिए नारद मुनि से अपनी व्यथा कही । तब नारद मुनि ने इसका कारण बताया कि आप योग साधना के दौरान शरीर की स्थिती सही नहीं रखते इसलिए ऐसा परिणाम सामने आया और निवारण कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगा कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करे साथ ही रूप के देवता श्री कृष्ण की पूजा कर उनकी आरती करे, इससे आपको पुन: खोया हुआ सौन्दर्य प्राप्त होगा। राजा नै यही कर अपने शरीर को स्वस्थ किया। इस प्रकार इस दिन को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं ।

चूकि नरक चतुर्दशी दिवाली के एक दिन पहले मनाया जाता हैं जिसमे इसमें भी द्वार पर दीपक जलाये जाते है । इसी कारण इसे छोटी दीवाली कहते हैं ।

नरक चतुर्दशी हनुमान जयंती के रूप मे भी मनायी जाती है। ऐसी मान्यता हैं कि इस दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस के दिन हनुमान जी ने माता अंजना के गर्भ से जन्म लिया था । अतः इस दिन दुखों एवम कष्टों से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की पूजा की जाती हैं जिसमे कई लोग हनुमान चालीसा, हनुमानअष्टक का पाठ किया जाता है।


3- दीपावली

तीसरे दिन अमावस्या को दीवाली का त्योहार पूरे भारतवर्ष के अतिरिक्त विश्वभर में बसे भारतीय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है। यह भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न तरीकों से मनाया जाता है।

4- अन्नकूट या गोवर्धन पूजा

दीवाली के पश्चात अगले दिन अन्नकूट मनाया जाता है। यह दीवाली की श्रृंखला में चौथा उत्सव होता है जो कि कार्तिक माह की प्रतिपदा तिथि के दौरान मनाया जाता है।

हिन्दु कैलेण्डर में गोवर्धन पूजा का दिन अमावस्या तिथि के एक दिन पहले भी पड़ सकता है। इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र देवता को पराजित किये जाने की मान्यता है । इसलिए लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं।

यह दिवस यह सन्देश देता हैं कि हमारा जीवन मे  प्रकृति प्रदत्त हर एक चीज़  महत्वपूर्ण है जिस  पर  हमारा जीबन निर्भर करता हैं । प्रकृति प्रदत्त चीजे जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, नदी और पर्वत आदि से हमारा जीबन चलता है इसलिए हमें उन सभी  धन्यवाद देना चाहिये | इस प्रकार यह पर्व इन सभी प्राकृतिक धन सम्पति के प्रति हमारी नमन की भावना को व्यक्त करता हैं |

इस दिन विशेष रूप से गाय माता की पूजा का महत्व होता हैं | उनके दूध, घी, छांछ, दही, मक्खन यहाँ तक की गोबर एवम मूत्र से भी मानव जाति का कल्याण हुआ हैं | ऐसे में गाय की इस दिन पूजा की जाती है।

इस दिन गोधन कूटने की प्रथा है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियां घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं। दोपहर पर्यन्त यह सब करके बहन भाई पूजा विधान से इस पर्व को प्रसन्नता से मनाते हैं।

गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। इस दिन गेहूँ, चावल जैसे अनाज, बेसन से बनी कढ़ी और पत्ते वाली सब्जियों से बने भोजन को पकाया जाता है और भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है। आज कई जगहों में इसने विशाल भोज का स्वरुप धारण कर लिया है आज कल इसे आधुनिक युग में पार्टी की तरह मनाया जाने लगा गया है।

महाराष्ट्र में यह दिन बालि प्रतिपदा या बालि पड़वा के रूप में मनाया जाता है। वामन जो कि भगवान विष्णु के एक अवतार है, उनकी राजा बालि पर विजय और बाद में बालि को पाताल लोक भेजने के कारण इस दिन उनका स्मरण किया जाता है। यह माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बालि इस दिन पातल लोक से पृथ्वी लोक आता है।

गोवर्धन पूजा का दिन गुजराती नव वर्ष के दिन के साथ भी जुड़ता है जो कि कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष के दौरान मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा उत्सव गुजराती नव वर्ष के दिन के एक दिन पहले मनाया जा सकता है।

ऐसी मान्यता है कि कुछ भी हो जाए, इस दिन खुश रहना चाहिए क्यों कि यदि कोई किसी भी कारण से दु:खी या अप्रसन्‍न रहता है, तो वर्ष भर दु:खी ही रहता है। इसलिए यह पर्व प्रसन्‍नता / ख़ुशी का दिन भी कहा जा सकता है।

ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन स्नान से पूर्व पूरे शरीर में सरसों का तेल लगाकर स्‍नान करने से आयु व आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा दु:ख व दरिद्रता का नाश होता है।



5- भैया दूज

हिन्दू धर्म में भाई-बहन के स्नेह-प्रतीक दो त्योहार मनाये जाते हैं -

एक रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है।

दूसरा त्योहार, 'भाई दूज' का होता है।

दिवाली के दो दिन बाद शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है।
इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनके लम्बे और स्वस्थ तथा सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं और भाई अपनी बहनों को उपहार प्रदान करते हैं। भाई दूज का यह त्योहार भाई बहन के स्नेह और प्रेम के पवित्र भाव को सुदृढ़ करता है।

इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। और बहनें भाइयों को तेल लगाकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। यदि गंगा यमुना में नहीं नहाया जा सके तो भाई को बहन के घर नहाना चाहिए। इसका लक्ष्य भाई की उम्र बढ़ना और जीवन के कष्ट दूर करना है।

इस दिन बहन के घर भोजन मे चावल का सेवन करने का विशेष महत्व है। बहन चचेरी अथवा ममेरी कोई भी हो सकती है। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि किसी स्त्रीलिंग पदार्थ का ध्यान करके या उसके पास बैठ कर भोजन करना शुभ माना जाता है।

भारत मे त्यौहार का लक्ष्य प्रेम के रिश्ते को और बढ़ाना है। कई पौराणिक कथाओं से सिद्ध हुआ हैं कि भाई बहन का रिश्ता सदैव एक दुसरे में प्राण न्यौछावर के लिए तैयार रहता हैं. भाई दूज की परंपरा में ऐसी ही मान्यता हैं, जिसमे बहन अपने भाई की सारी विपत्तियों को पहले स्वयं पर लेती हैं. अपने भाई की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करती हैं और बदले में उससे कुछ नहीं मांगती।



निष्कर्ष -

इस प्रकार आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक और बौद्धिक लाभ और परम लाभ पहुचाने वाले उत्सवों का नाम है दिवाली का उत्सव।

इसमे सामाजिकता को आध्यात्मीकता से जोड़ा गया है।
इसमे खुशी को आनंद से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को समाज से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को लोक से जोड़ा गया है।
इसमे छोटो और बड़ो दोनों को जोड़ा गया है।
इसमे स्वास्थ्य को सम्पदा से प्राथमिक मान  कर जोड़ा गया है।
इसमे सुख को स्वास्थ्य से जोड़ा गया है।
इसमें व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य को पशुओं से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य की मनुष्य से जोड़ा गया है। 
मनुष्य को उसके देवत्व से जोड़ा गया है
इसमे कुछ चीजो को बाहर निकलने और कुछ चीजो को अंदर लाने से जोड़ा गया है।
इसमे बाह्य और आतंरिक दोनों को प्रकाशित करने पर बल दिया गया है
आइये इसी रूप मे प्राकृतिक रूप से दीपावली मनाये ..

आप सभी को  प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ।

आप सभी की जय हो ..दुखो और कष्टों पर विजय मिले । जीबन का हर पल प्रकाश से आलोकित हो
हर सांस मे व्यक्ति और समाज का  मंगल हो.----

Thursday, October 20, 2016

पानी बचाने के 11 कारगर तरीके

save water के 11 कारगर तरीके!!

जल बिन सब जल जाता है। इसलिए जल को जीवन की संज्ञा दी जाती है।

जल की कमी आज एक भयानक problom बनती जा रही है और ग्लोबल तनाव का यह एक कारण भी ।

सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे आसपास ही नहीं पूरे विश्व मे स्वच्क्ष पानी की कमी है। ऐसे मे हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि पानी की बचत करे। ऐसे ही एक दिन जब 24  घण्टे से ऊपर विद्युत नहीं थी तो पानी की प्रॉब्लम  उत्पन्न हो गयी।  फिर पर सतत बिचार और उन विचारो का क्रियान्यवन शुरू किया।इसका ही अनुभव शेयर कर रहा हूँ,

हमें बहुत सारा पानी बचाने के लिए  बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं है । हमें सिर्फ अपनी आदतों मे छोटी छोटी बातों मे ध्यान देकर छोटा छोटा   बदलाव करने की जरूरत है और सचेत रहने की जरुरत है।

1- सबसे पहले बाथरूम में घर के नलों में टिप टिप कर पानी रिसने वाले नलों को बदल देना चाहिए । थोड़ी सी खराब टोटी लगभग दिन भर में करीब 1 से दो बाल्टी पानी का रिसाव कर सकती है। इसलिए जरूरी है कि पानी बचाने के लिए खराब नल या या नल के वासर को बदल दिया जाए ।

2- खराब फ्लस के कारण हर महीने हजारों लीटर पानी बर्बाद होता है । एक बार फ्लस करने मे करने में करीब 6 से 7 लीटर पानी का use होता है । अतः जरूरी है कि पानी बचाने के लिए फ्लस की जगह पानी की बाल्टी का प्रयोग करें । अगर यह संभव नहीं है फ्लस के बॉक्स में पुरानी यूज़ की हुई बोतल मे एक बोतल पानी भरकर रख दे । इस तरह है हर बार फ्लस मे करीब 1 लीटर पानी की बचत की जा सकती है और अगर घर के 5 सदस्य 2 टाइम फ्लस use करते है तो 10 से 15 लीटर पानी औसत रूप से बचाया जा सकता है।

3- आजकल हर घर में water filter रखने का चलन सा हो गया है इसकी सबसे बड़ी अच्छाई है कि पीने को स्वच्छ् पानी मिलता है इसका दूसरा पहलू ये है कि 1 लीटर का शुद्ध पानी देने में करीब यह 3 से 4 लीटर तक पानी प्रयुक्त करता है । 1 दिन में 10 लीटर शुद्ध पानी बनाने में 35 - 40 लीटर पानी खर्च करता है । और अधिकतर घरों मे यह पानी यूँ ही नालियो मे बहा दिया जाता है ।इस प्रकार महीने का आकलन किया जा सकता हैं कि कितना पानी बह जाता है । अतः जरूरी है कि हम इस पानी को बाल्टी मे रोक कर इक्कठा करे। और इस बाल्टी के पानी का प्रयोग हम बर्तन धोने, पौधों की सिंचाई , फ्लस करने, पोछा लगाने, आदि सामान्य कार्यो मे प्रयोग कर सकते हैं ।

4- कपड़े 1 धुलना हो या 6-7, वाशिंग मशीन से धुलाई करने पर पानी उतना ही पानी खर्च होगा इसलिए जरूरी है कि वाशिंग मशीन का प्रयोग करें जब 8 से 10 कपड़ो को एक साथ धुला जाना हो । कपड़े को खंगालने के लिए वाशिंग मशीन के बजाय बाल्टी में पानी का प्रयोग करें इस तरह वाशिंग मशीन में कपड़ों की धुलाई से महीने में हजार लिटर पानी बचा सकते हैं ।

5- बाइक या कार को पाइप से पानी डालकर धुलने में बहुत सारा पानी खर्च होता है जबकि अगर हम एक बाल्टी में आधा बाल्टी पानी लेकर कार की धुलाई करें और थोड़ी सा शारीरिक श्रम करें तो इस धुलाई में 50 से 300 लीटर तक पानी बचा सकते हैं ।

6- अक्सर घर मे नल या सिंक में बर्तन धुलने में काफी पानी खर्च होता है । तो जरूरी है कि हम दोहरे खाने वाले सिंक का प्रयोग करें । अगर ऐसा संभव ना हो तो बर्तन धुलने के लिए टब प्रयोग कर एक बार में करीब 15 से 20 लीटर पानी की बचत की जा सकती है ।

7- नहाते समय हम अक्सर shower की जगह बाल्टी में पानी नल भर bath करें तो हम बहुत सारे पानी की बचत कर सकते हैं । बाल्टी से नहाने में एक या दो बाल्टी पानी से नहा कर करीब एक बार मे एक व्यक्ति के द्वारा करीब 20 लीटर पानी के हिसाब से 4 व्यक्तियों के द्वारा 100 टन पानी की बचत कर सकते हैं ।

8- अक्सर शेव करते समय हम bashing का नल खुला छोड़ देते है । इस आदत से बचने के लिए जरूरी है कि हम mug में पानी लेकर सेविंग करें । इससे हम हर बार में 4 से 5 लीटर पानी बचा सकते हैं । क्यों की मग या जग मे पानी लेकर सेविंग करने में अधिकतम 1 से 2 लीटर पानी प्रयोग में होगा ।

9 - सब्जी धुलने के लिए छोटी बाल्टी का प्रयोग करे और इस प्रयुक्त पानी को पौधों मे प्रयोग कर सकते है इस तरह हर दिन 10 से 15 लीटर पानी की बचत की जा सकती है।
घर के फर्श की धुलने के बजाये पोछा लगाने की बरीयता देना चाहिए । पोछा लगाने मे सिर्फ आधा बाल्टी पानी का प्रयोग होगा जब धुलने मे 50 से 70 लीटर पानी का प्रयोग हो सकता है।

10- पानी की टंकी मे सामान्य सा फुल होने पर बजने वाला इंडिकेटर/ alarm लगाए . 150 से 200 रूपये खर्च कर आप करीब टंकी ful होने से पानी बहने से बच सकते है और 40 से 50 लीटर पानी को बर्बाद होने से बचा सकते है।
इसमे अलार्म मे और बिजली की WAIR  जोड़ कर तार के दोनों सिरे  तार ऐसे पानी की टंकी मे डालना है कि इनकी आपस की दुरी २-३ इंच बनी  रहे  । और जब आप पानी का पंप on करगे तो साथ मे इस अलार्म को भी on कर दे ...पानी की टंकी भर गयी है -अलार्म बजने पर इसे बंद कर दे।
https://www.amazon.in/dp/B019YGK6AY/ref=cm_sw_r_wa_apa_BLF.xbBYYP8C
 इस अलार्म करने के बारे मे कुछ कहना नहीं है ,मैं  खुद १ साल से प्रयोग कर रहा हूँ।  आप चाहे तो ऐसा अलार्म कही से भी खरीद सकते है


11- बरसात मे बहुत सारा पानी बह जाता है । इसके लिए water harvesting तरीको का प्रयोग कर सकते है । सामान्य सा उपाय है कि छतों से इस पानी की एक groung tank मे इकठ्ठा किया जाए और जरुरत पर इसका use किया जाए।
अक्सर हम यह calculation एक व्यक्ति को count कर लगाते है। 4 से 5 व्यक्तयो के परिवार के लिए ये बचत बहुत ज्यादे होगी।



निष्कर्ष - कहते है आज की बचत कल की सुरक्षा। जल की बचत कर हम चहुमुखी लाभ का कार्य कर सकते है

1) हम खुद के बजट के expense यानि पानी के बिल मे कमी कर सकते है और बचत कर सकते है । इस indirect बचाये हुए धन को हम कही और प्रयोग कर सकते है।

2) हम indirect तरीके से अपने देश की सेवा कर सकते है । अपने देश के प्रति अपने duties को निभा सकते है।और अपने देश के save water अभियान का एक हिस्सा बन सकते है। जिसकी chain ग्लोबल होती जा रही है।

3) जब हम जल संसाधन की रक्षा करते है तो एक प्रकार से environment के protection मे भी भागीदारी करते है।

4) इस सबके साथ हम एक example पेश करते है और दूसरों को भी इस कार्य के लिए motivate कर सकते है।

...........Save water........

Sunday, October 16, 2016

अरुणिमा सिन्हा : संघर्ष की जीवित प्रतिमूर्ति

अरुणिमा सिन्हा : संघर्ष की जीवित प्रतिमूर्ति

जीवन प्रतिकूलताओं का संजाल है इसी कारण जीबन मे संघर्ष भी है यह संघर्ष ही हमें सामर्थ्यवान और महान बनाता है ।

चाहे राम हो पांडव सभी ने सुख का त्याग कर दुःख झेला है इसी कारण वो आज नायक कहे जाते है ।

ऐसी ही एक एक नायक है अरुणिमा सिन्हा जिनके जीवन ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया है और संघर्ष करने की प्रेरणा दे रहा है और आगे भी प्रेरणा देता रहेगा।

भारत की अरुणिमा सिन्हा ने इसी साल जुलाई मे इंडोनेशिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पुंकाक जया पर तिरंगा फहराने में सफलता प्राप्त की है । अचानक जब इस न्यूज़ को अख़बार मे पढ़ा तो जेहन मे पांच साल पहले की एक घटना दिमाग मे घूम गयी कि कही ये वही लड़की तो नहीं है। या कही वो लड़की तो नहीं है जिसने २-३ साल पहले हिमालय पर्वत पर चढ़ाई की थी

कौन है अरुणिमा सिन्हा -

उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर के शाहजादपुर इलाके के पंडाटोला मुहल्ला के एक छोटे-से मकान में रहने वाली अरुणिमा सिन्हा के बचपन से ही जीवन का बस एक ही लक्ष्य थाः भारत को वॉलीबॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना. इसके लिए के उन्होंने कक्षा 6 से ही प्रयास करना शुरू कर दिया। साथ साथ पढाई भी जारी रखी। समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री लेने के साथ अरुणिमा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाने लगीं.

इसी बीच 11 अप्रैल, 2011 की एक घटना ने उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी. . जब पद्मावत एक्सप्रेस से वह दिल्ली जा रही थीं। बरेली के पास कुछ अज्ञात बदमाशों ने उनके डिब्बे में प्रवेश किया।

अरुणिमा को अकेला पाकर वे उनकी चेन छीनने लगे। छीना-झपटी के बीच बदमाशों ने उन्हें ट्रेन से नीचे फेक दिया। जिससे उनका बांया पैर कट गया।

लगभग सात घण्टों तक वे बेहोशी की हालत में वही पड़ी रही और तड़पती रहीं। सुबह टहलने निकले कुछ लोगों ने जब पटरी के किनारे अरुणिमा को बेहोशी की हालत में पाया तो तुरंत अस्पताल पहुंचाया। और वहां से दिल्‍ली के एम्‍स में भर्ती कराया गया। एम्स में इलाज के दौरान उनका बाया पैर काट दिया गया।

लोंगो को लगा की बास्‍केट बॉल की राष्‍ट्रीय स्‍तर की खिलाड़ी के रूप मे यह लड़की अब अपने जीवन में कुछ नहीं कर पायेगी। लेकिन उन्होंने जि़न्दगी से हार नहीं मानी और जीबन को एक खेल मान कर फिर से उठ खड़ी हुई।

आगे एम्स  मे बिताये हुए इन चार महीनो ने अरुणिमा की सोच , साहस और हौसला को और भी मजबूत किया और विश्व की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट को फतह करने का एक नया संकल्प लिया।

इस संकल्प को मूर्त रूप देने के लिए अरुणिमा एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली महिला पर्वतारोही बछेंद्रीपाल से मिलने जमशेदपुर पहुंची ।

और अपने लक्ष्य पर कार्य शुरू किया। बछेंद्रीपाल की देखरेख में नेपाल , लेह , लद्दाख मे पर्वतारोहण के गुण सीखे |उत्तराखंड के नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनिंग और टाटा स्टील के प्रशिक्षण लेने के बाद 1 अप्रैल 2013 को उन्होंने एवेरेस्ट की चढ़ाई शुरू की और 52 दिन के बाद 21 मई को वे एवरेस्ट की चोटी फतह करने वाली पहली महिला विकलांग / दिव्यांक पर्वतारोही बनी |

अरुणिमा का मानना  है विकलांगता व्यक्ति की सोच में होती है। हर किसी के जीवन में पहाड़ से ऊंची
कठीनाइयां आती हैं, जिस दिन वह अपनी कमजोरियों को ताकत बनाना शुरू करेगा उस दिन हर ऊँचाई बौनी साबित होगी। अरुणिमा ने  इस साबित भी किया। 

अरुणिमा सिन्हा यहीं नहीं रुकी इसी क्रम में वे अफ्रीका की किलिमंजारो और यूरोप की अल्ब्रुस चोटी पर तिरंगा फहराया |

अरुणिमा ने केवल पर्वतारोहण , बल्कि आर्टिफिसियल ब्लेड running में भी अपना नाम उज्जवल किया है ,

चेन्नई में हुए ओपन नेशनल गेम्स पैरा में 100 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता |

उसके बाद विश्व के चार अन्य महाद्वीप पर सफल झंडा रोहण किया इसमें अफ्रीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका , की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराया हैं।

उनकी एक पुस्तक है born again in mountain जिसका विमोचन माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने किया है।

भारत सरकार ने अरुणिमा को पदमश्री सम्मान भी दिया है।

आज कल आप उन्नाव के बेथर गांव में शहीद चंद्रशेखर आजाद खेल अकादमी और प्रोस्थेटिक लिंब रिसर्च सेंटर के रूप में अपने सपने को आकार देने में भी जुटी हैं.

अरुणिमा कहती हैं, ''मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं। पर हमें अपने लक्ष्य से भटकता नही चाहिए बल्कि उनका सम्मान और सामना करना चाहिए।

अरुणिमा का जीबन संघर्ष करने वालो को सदा प्रेरणा देता रहेगा .....
आप की सदा जय हो ...आप को सदा विजय मिले ...मंगल हो

Friday, October 14, 2016

लालच बुरी बला है...

लालच बुरी बला है..

यह एक पुरानी कहावत है । बचपन मे मैने एक कहानी बन्दर और मगरमच्छ की पढ़ी थी। आज आपके लिए यही कहानी लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।

बहुत समय पहले की बात है की एक जंगल मे नदी के किनारे एक पेड़ था पेड़ पर एक बन्दर रहता था और पानी मे भी एक मगरमच्छ रहता था |

बन्दर जंगल के इस पेड़ के मीठे फल को खाता रहता था और हमेसा मस्त रहता था और साथ वो फल को मगर को भी खिलाता था । इससे दोनों मे अच्छी दोस्ती हो गयी थी।

दोनों अक्सर अपने सुख दुख share करते रहते थे। और अपना अकेलापन भी  काटते थे। लेकिन मगर धूर्त  और काइयाँ भी था। यह बात बन्दर को नहीं पता था वो मगर को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता था।

एक दिन मगरमच्छ के दिमाग मे एक bad आईडिया आया । उसने सोचा की यह बन्दर इतना मीठा फल खाता है , तो इसका कलेजा कितना मीठा होगा इस पर उसने बन्दर के कलेजे को खाने का प्लान बनाया ।

एक दिन जब बन्दर नदी के किनारे आया तो मगरमच्छ ने अपने plan के अनुसार बन्दर को लालच का एक offer दिया - "बन्दर भाई नदी के उस पार बहुत ही सुन्दर और मीठे फल के पेड़ है लेकिन मैं पेड़ पर नहीं चढ़ सकता हूँ अगर तुम चाहो तो उन फलो का आनंद उठा सकते है।"

बंदर ने पूछा मगर भाई -आप को कैसे पता कि वो फल मीठे है ? मगरमच्छ ने जबाब दिया की मैंने वहाँ के बंदरो को बहुत मजे लेकर फल खाते देखा है और मैंने भी उन फलों को खाया है । और वहाँ के बन्दर मेरे दोस्त भी है लेकिन तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो , तो मैंने सोचा की तुम को भी उनका आनंद उठा लेने का मौका दूँ।

बन्दर के मन भी उन फलों के खाने का लालच आ गया । और उसने मगर की बात पर विश्वास कर लिया। और वो कुछ भी करने को मानसिक रूप से तैयार हो गया । उसने मगरमच्छ से बोला की भाई मे उस पार जाकर उन फलों का स्वाद कैसे ले सकूंगा। इस पर मगर ने बोला – भाई तुम्हारा ये मगर दोस्त किस दिन के लिए है मैं तुम्हे वहाँ ले कर चलता हूँ। आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ।

बन्दर बहुत ही खुश हुआ | वह जाकर मगरमच्छ की पीठ पर बैठ गया । लेकिन नदी की बीच धारा मे पंहुच कर मगर रुक गया और बन्दर से बोला -"तुम इतने मीठे फल खाते हो तो तुम्हारा कलेजा भी खूब मीठा होगा | मैं तुम्हे मार कर तुम्हारा कलेजा खाऊंगा।

यह सुनकर बन्दर बहुत डर गया और बोला भाई मुझको माफ़ कर दो और मुझको छोड़ दो , लेकिन मगरमच्छ नहीं माना और अपनी बात पर अड़ा रहा।

इसके बाद बन्दर ने अपना दिमाग लगाया और मगर से बोला - भाई तुम्हे पहले बोलना था न कि आपको मेरा कलेजा का स्वाद चाहिए मैं आपको दे देता । मै अपना कलेजा पेड़ पर ही भूल आया हूँ । कल ही उसकी साफ सफाई की थी और सूखने के लिए पेड़ पर टांग रखा था जल्दी मे मैं उसको लाना ही भूल गया ।

बेवकूफ मगर ने बन्दर की बात पर विश्वास कर लिया। और वापस पेड़ की ओर चलने लगा ।

किनारे पर पहुचते ही बन्दर उछल कर पेड़ पर चढ़ गया और बोला बेवकूफ मगर आज से तुम्हारी हमारी दोस्ती खत्म । मैं विश्वासघातियों से दोस्ती नहीं रखता ।

निष्कर्ष -
1- बन्दर ने मन ही मन निष्कर्ष निकाला कि लालच बुरी बला है । कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। दरअसल किसी भी चीज को पाने की इच्छा में सही और गलत , अच्छे और बुरे का ध्यान न रखना ही लालच का भाव हैं । जिस वस्तु पर हमारा कोई अधिकार न हो उसे पाने की चाह भी हमें लालच के रास्ते की ऒर ले जाती हैं और इस रास्ते से सदैव दूर रहे क्यूंकि यह विनाश का रास्ता हैं ।  क्यों की बन्दर अगर दिमाग नहीं लगता तो उसकी जान जा सकती थी।लेकिन आज लालच के चक्कर मे रोज अनेको लोग अपनी जान गवाँते है.

2 -लालच का भाव ही मनुष्य को अहित के मार्ग पर ले जाता हैं | चूकि लालच की इच्छा में हमें सही गलत का ज्ञान नहीं रहता बस उसे पाने लालसा होती हैं । ऐसे में वो एक गहरी खाई मे गिरने की तरह है जब पता चलता है कि मै गलत हूँ तो तब वो वापस भी नहीं लौटना कठिन होता है।


3- दूसरे की बात पर सोच समझ कर फैसला लेना चाहिए और अपने मे ही संतुष्ट रहना चाहिए । आज इसी लालच के कारण हजारो लोगकानून तोड़ने और जेल मे  कैद की सजा के शिकार हो रहे है । और तो और human trafficking का शिकार होना भी इसी लालच का एक परिणाम है ।

4- हमें किसी के साथ दोस्ती भी सोच समझ कर करना चाहिए । जिससे भी दोस्ती करे उसके बारे मे भुत (past) की कुछ बातों मतलब उसके चाल चलन के बारे मे पता लगा ले।

5- जब कोई एक बार जब कोई लालच में पड़ जाता है तो उसका यह लालच आसानी से खत्म नहीं होता। और उसको पता ही नहीं चलता कि उसे कब रुकना है।  अतः लालच की एक CHAIN से बन जाती है.

6-अगर कोई भी लालची होगा तो उसके साथ भी कभी अच्छा नहीं होगा । मगरमच्छ ने भी लालच के कारण अपना एक सच्चा दोस्त खो दिया ।और आज भी इस दोस्ती के कारण आंसू बहा रहा है। यानि नुकसान cheating करने वाले cheater का भी होता है।

6- आस्तीन के साँप से दोस्ती नहीं करनी चाहिए। ऐसे छुपे चेहरे वाले लोग ही आज समाज मे अपराध को अंजाम दे रहे है अतः सतर्क (conscious ) रहे स-तर्क (logical) भी।