Friday, November 4, 2016

छठ : एक लोक पर्व

छठ : एक लोक पर्व

सामान्यतया जन उसे ही स्वीकार करता है जो उसके बीच का और उस जैसा ही हो। इसीलिए आम ने सूर्य की शक्तियों और उसकी ऊर्जा का मानवीकरण छठ मैया के रूप में कर ख़ास रूप दे दिया है । भारतीय संस्कृति और लोकगीतों में छठ का यही आधारभूत रूप रंग दीखता है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि का यह दिन भगवान सूर्य को समर्पित है।

बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के निवासी इस दिन जहां भी होते हैं सूर्य भगवान की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना नहीं भूलते. यही कारण है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।

इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है इसलिए इस पर्व को महिलाओं का हठयोग भी कहा जा सकता है।

प्रारम्भ होने की मान्यताएं :-

1- भगवान राम और सीता ने सर्वप्रथम इसकी पूजा की थी । भगवान राम सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता भगवान् सूर्य थे। और जब भगवान राम लंका से रावण का वध कर सीता के साथ अयोध्या वापस लौटे । रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक अपने कुलदेवता सूर्य का आशीर्वाद पाने के लिए इन्होंने अपनी पत्नी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा। और सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज प्रारम्भ किया। तभी से आमजन इस पर्व को मना रहे है।

2- ऐसी मान्यता है कि कुंती पुत्र कर्ण को दुर्योधन ने अपना मित्र बनाकर आज का भागलपुर बिहार का राजा बना दिया। कर्ण की माता कुंती और पिता सूर्य है। और इसके पूज्य देव सूर्य थे। कर्ण इनकी उपासना नित्य कमर तक पानी में जाकर करता था और पूजा के बाद जरुरतमंदों को दान भी देता था। वर्ष मे एक बार कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य की विशेष पूजा किया करता था।  सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।

3- छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। इस प्रकार यह व्रत पारिवारिक खुशहाली के लिए किया जाता हैं। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

4- छठ पर्व को लेकर एक मान्यता यह भी है कि साधु की हत्या के प्रायश्चित के लिए जब पांडु अपनी पत्नी कुंती और मादरी के साथ वन में थे तब पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी। इससे कुंती गर्भवती हुई और उसको पुत्र प्राप्त हुआ ।आज भी संतान प्राप्ति के लिए इसका।महत्व जुड़ गया तब से यह व्रत से संतान सुख प्राप्त के लिए किया जाता है।

5- पुराणों के अनुसार मनु - प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने इसके लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ किया । इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ। मृत शिशु को छाती से लगाकर प्रियव्रत और उनकी पत्नी विलाप करने लगी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक ज्योतियुक्त विमान पृथ्वी की ओर आया जिसमे एक नारी बैठी है। देवी ने खुद को ब्रह्मा की मानस पुत्री बताया और कहा कि वो संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों संतान प्रदान करती है वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं।
देवी स्पर्श से मृत बालक जीवित हो उठा। महाराज के विनय पर देवी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो। राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की। और तभी से छठ पूजा पूत्रोंं की दीर्घ आयु के लिए मनायी जाती है। और इसे संतान प्राप्ति की इच्छा से किया जाता हैं।

सामाजिक- सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक महत्व :

1- सम्पूर्ण जगत में सूर्य एकमात्र अक्षय ऊर्जा के स्त्रोत है।और भारत मे प्रकृति पूजा यहाँ की परंपरा रही है , सूर्य की पूजा किसी भी परम्परा से बहुत- बहुत पुरानी है। यह वैदिक काल से है। लेकिन आज सूर्य का मानवीकरण किया गया है। इसका आधार हमारा कृषि आधारित समाज है।

2- सूर्य देव की उपासना ही छठ पर्व से जुड़ा है और इसक वैज्ञानिक महत्व भी है। कहा जाता है कि अस्ताचलगामी और उगते सूर्य को अर्घ देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता और इंसान निरोगी रहता है।

3- सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभी सभ्यता में देखी जा सकती है। पौराणिक काल से ही सूर्य को आरोग्य के देवता माना गया है । वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य की किरणों में कई रोगों को समाप्त करने की क्षमता पाई गई है ।

4- सूर्य पूजा का महत्व इतना अधिक किसी पूजा में नहीं मिलता. इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी हैं। कहते हैं इस दिन धरती पर सूर्य की हानिकारक विकिरण आती हैं। इससे मनुष्य जाति को कोई प्रभाव न पड़े इसलिए नियमो में बाँधकर इस व्रत को संपन्न किया जाता हैं. इससे मनुष्य स्वस्थ रहता हैं।

5- छठ पूजाअपनी सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष के कारण महत्त्व रखता है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल तंबू कनातों की जरुरत है न ही मंदिरों की और न ही इसके मूर्तियों की। बिजली के लट्टुओं की चकाचौंध, पटाखों के धमाके और शोर शराबे से दूर है यह पर्व ।

6- इस पूजा में वही चीजें चढ़ेगीं जो किसान और खेतिहर जीवन में सर्वाधिक सुलभ और आम महत्व की है। गुड़, गन्ना, सिंघाड़ा, नारियल, नींबू, हल्दी, अदरक, सुपारी, साठी का चावल, जमीरी, संतरा, मूली और सामान्य फल फूल के अलावा गाय का दूध।

7- आम जीवन मे रोज प्रयुक्त की जाने वाली चीजे खरीदी जाती है जिनका वर्ष भर प्रयोग होता है। बाँस निर्मित सूप और दौरी या बड़ी टोकरी, मिट्टी के बरतन दिए, गन्ने की पहली फसल और गन्ने से बना नया गुड़, नया धान से निकला हुआ नया चावल और उसका लड्डू और भुना लाई, कुट्टी का आटा, और गेहूँ से निर्मित प्रसाद आदि ।

8- लोक जीवन मे गाये जाने वाले लोकगीतों से युक्त होकर यह लोक जीवन की भरपूर मिठास और नया रूप प्रदान करता है । शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में रगां हुए इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पंडित पुरोहित के विधि विधान की जरूरत पड़ती है ।

9- इस पर्व मे एक पडोसी और एक पड़ोस के साथ और उसकी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। और ख़ुशी से इस पर्व के पूर्णहुति मे सहयोग करता है जिससे लोक पक्ष मजबूत होता है।

10- इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। घर के आसपास की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबंधन, तालाव या नदी किनारे पूजा की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता।

11- इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक पास पड़ोस और समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिकता के भाव से किये गए कार्य और कर्म का विराट प्रदर्शन है।


गीतों में भइया से छठ पर पूजा की मोटरी लाने का और धरती की हरयाली और सघन करने का आग्रह भी है। परदेसी पति को याद दिलाया जाता है कि घर पर छठ होने वाला है और अपनी जमीन से उखड़ने के दर्द को उत्सवधर्मिता से मिटाने का प्रयास किया गया है। पूजा के लिए लाए पके केले को सुग्गा के जूठा कर देने का गुस्सा है। लेकिन मूर्छित सुग्गे को जीवन दान के लिए सूर्य देव से आराधना और बिनती भी है कि वह जल्दी उदित हों ताकि उन्हें अ‌र्घ्य दिया जा सके।



छठ पूजा की विधि:

चार दिन का यह पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। इसे उत्तर भारत में सबसे बड़ा त्यौहार भी माना जा सकता हैं। इस पर्व मे गंगा स्नान या स्थानीय नदी या तालाब का महत्व सबसे अधिक होता हैं। जिसमे खड़े होकर यह पूजा संपन्न की जाती है। पूजा मे छठ देवी जो कि सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है।

इस पूजा को घर की महिलायें एवम पुरुष दोनों करते हैं। पत्नी बीमार है तो पति ब्रत रहते है। इसमें स्वच्छ एवं नए कपड़े पहने जाते हैं जिसमे सिलाई न की गयी हो जैसे महिलायें साड़ी एवम पुरुष धोती पहन सकते हैं। इन चार दिनों में व्रत करने वाला धरती पर सोता हैं। जरुरत पर कम्बल या चटाई का प्रयोग कर सकता हैं।
इन दिनों घर में प्याज लहसन एवम माँस मंदिरा का प्रयोग वर्जित होता है और सामान्यता खाना घर से बाहर बनाता है । सामान्य घरो मे बाटी चोखा बनता दीखता है।

यह एक चार दिवसीय त्यौहार हैं

1- नहाय खाय का यह पहला दिन होता हैं। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता हैं। इस दिन सूर्य उदय के पूर्व पवित्र नदियों का स्नान किया जाता हैं इसके बाद ही भोजन लिया जाता हैं जिसमे कद्दू खाने का महत्व है।

2- लोहंडा और खरना यह दूसरा दिन होता हैं जो कार्तिक शुक्ल की पंचमी कहलाती है। इस दिन निराहार रहते हैं रात्रि में खिरनी खाई जाती हैं और प्रसाद के रूप में सभी घर वाले इसे ही खाते है। इस दिन आस पड़ौस एवं रिश्तेदारों को भी न्यौता दिया जाता हैं।

3- संध्या अर्घ्य यह तीसरा दिन होता हैं जिसे कार्तिक शुक्ल की षष्ठी कहते हैं। इस दिन संध्या में सूर्य पूजा कर ढलते सूर्य को जल चढ़ाया जाता हैं जिसके लिए किसी नदी अथवा तालाब के किनारे जाकर टोकरी एवम सुपड़े में देने की सामग्री ली जाती हैं एवम समूह में भगवान सूर्य देव को अर्ध्य दिया जाता हैं। इस समय दान का भी दिया जाता है। इस दिन घरों में प्रसाद बनाया जाता हैं जिसमे लड्डू का अहम् स्थान होता हैं।

4- उषा अर्घ्य का यह अंतिम और चौथा दिन  सप्तमी का दिन होता हैं। इस दिन उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता हैं एवम प्रसाद का वितरित किया जाता हैं।

यह चार दिवसीय व्रत बहुत कठिन साधना से किया जाता हैं जिसमे साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखते है। इसे हिन्दुओ का सबसे बड़ा व्रत कहा जा सकता  हैं। इस त्यौहार पर नदी एवम तालाब के तट पर मेला लगता हैं। इसमें छठ पूजा के गीत गाये जाते हैं। जहाँ प्रसाद वितरित किया जाता हैं। और लोग ख़ास तौर पर महिलाये बिना भेद भाव के प्रसाद अपने आँचल मे मांगती भी है।

कार्तिक छठ की तरह ही चैती अथवा चैत्री छठ मनाया जाता हैं. बस तिथी में अन्तर होता हैं. दोनों ही पूजा में सूर्य देव की पूजा की जाती है।

भगवान सूर्य हम सभी के जीवन मे प्रकाश भरे।

Tuesday, November 1, 2016

टूटते परिवार : कारण से निवारण तक


टूटते परिवार : कारण से निवारण तक


बीते दिवाली कले त्यौहार मे  मुझे लगा कि  आज कल त्यौहार मे  वो बात नहीं रही है जब एक दो दशक पहले किसी त्यौहार को मनाने  मे  संयुक्त परिवार के सभी साथ होकर कोई पर्व मनाते थे.फिर मैंने कुछ कारणों की तरफ ध्यान दिया तो बड़े ही अजीब से नजर आये। ..फिर सोचा क्यों न इसी पर कुछ लिखा जाए कि  क्यों आज संयुक्त परिवार टूट रहे है. क्यों अपने आज साथ नहीं है।

सर्वप्रथम आज प्रत्येक विचारशील व्यक्ति आधुनिकता को पारिवारिक संगठन के लिए एक संकट के रूप में
स्वीकार करने को तत्पर दिखाई देता है इस स्वीकारोक्ति की यथार्थता की जांच के लिए कुछ बुनियादी
प्रश्नों का विश्लेषण अपेक्षित है

क्या है आधुनिकता:

सरलतम शब्दों में समय के साथ चलने की मनोवृत्ति आधुनिकता है. इसके ठीक विपरीत समय के पीछे चलना रुढिवादिता है. इसलिए दोनों से बचते हुए आधुनिकता को अपनाने की सलाह दी जाती है. लेकिन यदि आधुनिकता को अपनाना ही उचित है तो किसी भी दृष्टि से संकट मारने का क्या कारण है और क्यों यह परिवार के लिये संकट का कारण बनती जा रही है.?

जरूरत है इसके विचार और व्यवहार दोनों पक्षों पर विचार किया जाए क्योंकि समस्याएं दोनों तरफ है .

आधुनिकता का अर्थ है समय के साथ चलना है यानि वर्तमान के साथ समायोजित होकर जीना है लेकिन यहां समय का वर्तमान के परिप्रेक्ष मे मूल्याङ्कन नितांत आवश्यक हो जाता है.

किसी भी सामाजिक परिप्रेक्ष्य की पहचान उसमें स्वीकृत जीवन मूल्यों से होती है. दरअसल संबंधित जीवन मूल्यों के आलोक में ही किसी भी सामाजिकता को उचित रूप से परिभाषित किया जा सकता है.प्रश्न है कि जीवन मूल्य क्या है?

जीवन मूल्य दरअसल जीवन और जगत के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण से निकले होते हैं. यही कारण है कि सामाजिक गतिशीलता को उर्ध्वगामी बनाए रखने के लिए जीवन मूल्यों के प्रति सजकता और उनका स्पष्ट बोध बहुत ही आवश्यक है. जीवन दर्शन और उस पर आधारित जीवन मूल्य किसी समाज की अपेक्षाओं का निर्धारण करते हैं जिसकी पूर्ति हेतु वह समाज विभिन्न आविष्कारों को संभव बनाता है और इनका उपयोग कर अपने आवश्यकताओं को शांत करता है. यदि सब कुछ सामंजस्यपूर्ण होता रहा तो मानव जीवन विकास पथ पर आगे बढ़ता रहेगा.

आज संपूर्ण विश्व मूल्यों के सन्दर्भ मे भ्रम का शिकार है परिणाम स्वरुप समाज में जीवन दर्शन,जीवन मूल्य, अपेक्षा,आविष्कार तथा उनके उपभोग के बीच समन्यव समाप्त होता जा रहा है. यह वास्तव मे आदर्श और व्यवहार के बीच की खाई है जो बढती ही जा रही है. यह सत्य है कि जीवन दर्शन की स्पष्ट अवधारणा प्रत्येक व्यक्ति को नहीं होती है लेकिन जीवन मूल्यों का बोध और उनके प्रति संपूर्ण निष्ठा सामाजिक गतिशीलता की अनिवार्य शर्त है. इसके संबंध में भी भ्रम की स्थिति जीवन की साम्यावस्था को भंग कर सामाजिक गतिशीलता को दिशाहीन कर देती है . मानव जीवन को अशांत कर देती है. पूरे विश्व में यही हो रहा है ।

मूल्यात्मक बिभ्रम के कारण आज मनुष्य अपने आवश्यकताओं को समझने में भूल कर बैठा है . उसके समक्ष अनावश्यक आवश्यकतयों का एक पहाड़ सा खड़ा हो गया है. यदि आवश्यकता है तो वो मनुष्य की नकारात्मक उर्जा से प्रेरित है. इसी कारण मनुष्य के द्वारा अपनी उर्जा का सृजनात्मक प्रयोग न करके विलासता के लेकर विनाश तक के संसाधनों का आविष्कार किया गया है.

दिशाहीन अविष्कारों की बहुलता उपभोक्तावादी संस्कृति और गला काट व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है,वास्तव मे ये सब एक सिक्के के ही पहलू हैं और एक ही साथ चलते हैं और एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं. वर्तमान समय भी इसी ताने बाने से उलझा हुआ है .

उपभोक्तावाद का सर्वाधिक दुष्प्रभाव व्यक्तिगत चरित्र और पारिवारिक संरचना के ऊपर सर्वाधिक पड़ा है । ऐसे मे टूटन का दंश भी ये ही ज्यादे झेल रहे है।

1- पहले खेती का कार्य होता था. सभी लोग एक ही कार्य को खेत में मिलकर सामान रूप से मेहनत से करते थे। इसलिए परिवार मे मत- भेद तो होते थे लेकिन मन-भेद नहीं हो पाता था। आज एक परिवार के दो भाई भिन्न-भिन्न नौकरी कर रहे हैं, अलग-अलग मासिक आय और अलग अलग स्टेटस और रहन सहन आपस में जलन पैदा कर रही है । फलतः बढ़ते वैमनस्य से लोग अलगाव की तरफ अग्रसर हो रहे हैं।

2- आजीविका यानि नौकरी का का अलग शहर में होना भी लोगों को परिवारिक बिखराव का कारण बन रहा है। बढती जरूरतोंके साथ के साथ आज बच्चे शादी से पूर्व शिक्षण हेतु दुसरे शहर अथवा विदेश में होने के कारण घर से दूर होस्टल आदि में रह रहे हैं। ऐसी स्थिति में भी माता-पिता अकेले हो रहे हैं। इसके बाद नौकरी करना भी इसको और विस्तार देता है।

3- आज के उपभोक्तावाद के कारण प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक उपभोग की सामग्री एकत्र करने में व्यस्त हो रहा है और पूरा समाज इसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है. हर एक व्यक्ति यही सोच रहा है कि उपभोग युक्त सामग्री का अधिकाधिक संग्रह वह कैसे करें, इस प्रतिस्पर्धा में सभी मानवीय कर्तव्य और सामाजिक संबंध तथा मर्यादाएं टूटती जा रही. किसी को किसी और की ओर देखने की फुर्सत नहीं है. व्यक्ति व्यक्ति से कटता जा रहा है. पारस्परिक सहयोग मे निःस्वार्थ परोपकार का समापन होता जा रहा है.

4- आज व्यक्ति शुद्ध रूप से एक व्यवसाय तथा आर्थिक संस्था संस्था का रूप लेता जा रहा है. बात यहीं तक होती तो गनीमत थी लेकिन अर्थ एवं उपभोक्ता सामग्री की उपार्जन की अधिकतम लालसा के कारण व्यक्ति व्यक्तिगत और अपराधी प्रवृति का होता जा रहा है. उपभोग की सामग्री जुटाने के लिए व्यक्ति हर तरह का मार्ग अपनाने लगा है. उसे सही और गलत का पता तो है लेकिन वह उसे नजरअंदाज करने में लगा हुआ है. उपभोक्तावाद ने भोग की इच्छा को बढ़ाया है और बढ़ी हुई इच्छा ने मनुष्य की आवश्यकता को और बढाया है. और जब आवश्यकतायें बढ़ी है तो लोगों में इसे किसी भी तरीके से पूर्ण करने की भावना जागी है, यही हो रहा है और सारा खेल इसी मानसिकता की देन है

5- उपभोक्तावाद जन्य आवश्यक आवश्यकताओं के अंबार ने व्यक्तिगत चरित्र के पतन के साथ-साथ व्यक्ति को खुद में सिमटने के लिए बाध्य कर दिया है. उसके भीतर प्रेम और सहयोग के उन मौलिक आधारों का समापन हो रहा है जो कि परिवार बोध तथा मनुष्यता के आधारभूत संरचनात्मक घटक रहे है. परिणाम यह है कि परिवार जैसी नैसर्गिक संस्था मे दरार पैदा हो रही है. दूसरी ओर मनुष्य संकुचित व्यक्ति की आत्म विरोधी विशेषता से युक्त होकर अपना ही मूल्य होता जा रहा है. आज जिस परिवार ने उपभोक्तावादी मानसिकता को पूरी तरह अपना लिया उसमें वैक्तिक संबंध अपनी नैसर्गिक भावनात्मकता के मूल से कटकर व्यवसायिक बन गए है और संबंधो में भावनात्मकता समाप्त हो गई है.

6- आज संसाधनों के संग्रह तथा उनके उपभोग मे मनुष्य इतना व्यस्त हो गया है कि किसी भी संबंध को बोध समझ लेना उसके लिए आसान हो गया है. व्यक्तिगत आवश्यकता और उनकी पूर्ति के लोभ में व्यक्ति कितना असहाय हो चुका है कि उसके पास किसी भी संबंध को नैसर्गिक अर्थ में जीने के लिए समय ही नहीं रह गया है, पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई, भाई-बहन जैसे आज सारे संबंध अपनी स्वाभाविकता खो रहे हैं और भार बनने की राह पर अग्रसर है,यानि जिन आधारों पर पारिवारिक ढाचे को विकसित होता है वो टूटते जा रहे हैं ऐसी स्थिति में पारिवारिक ढांचे में बिखराव होना निश्चित है.

7- आज आवश्यकता आविष्कार की जननी नहीं रह गयी है । बल्कि आविष्कार ही आवश्यकता का जनक बन गये है। बाजार की समस्या यह है कि जो उत्पादन हो चुका है उसका उपभोग कैसे किया जाए ताकि उसका अधिक से अधिक लाभ मिले। मनुष्य की सोच यह हो गयी है कि अगर संतुष्टि न मिले तो कुछ और उपभोग की वस्तु खरीदी जाए। इस क्रम मे जल्द ही चीजो से ऊबन होने लगती है यही क्रम संबंधों मे भी उभर कर आने लगा है ।
किसी भी प्रकार तृप्ति की तलाश में पूरे विश्व के मनुष्यों को इधर-उधर विस्थापन करने के लिए मजबूर किया है। और समस्या यह है कि वह इसी की आड़ मे पाशविकता के धरातल पर भी उतरता जा रहा हैं और संबंधों में हिंसा का उभार आया हूं ।और हिंसा किसी भी प्रकार के मानवीय संबंध के लिए घातक होती है।

8- परिवार का मूल है प्रेम, परोपकार, सहयोग. धीरे-धीरे यह तत्व परिवार से गायब होते जा रहे हैं क्योंकि भागदौड़ और तनाव की दशा में व्यक्तियों से यह चीजे समाप्त होती जा रही है. ऐसे में परिवार की संस्थाएं घुटन की ओर अग्रसर हैं । घुटन से एक बेचैनी , एक असंतोष पैदा होता है जहां पर व्यक्ति नए नए संबंधों के सृजन में व्यस्त है आपसी सहमति के आधार पर अधिक तृप्ति की आशा लिए व्यक्ति इधर उधर भटकता रहता है। भटकाव बिघटन का भी कारण है।

9- एक आदर्श समाज और एक आदर्श परिवार और एक आदर्श सम्बन्ध की तलाश में व्यक्ति मानवीय संबंधों से कटता जा रहा है । ऐसे में वह आदर्श के पास जाने की उत्कंठा लिए हुए वह वर्चुअल दुनिया में एक नए प्रकार के समाजिक संबंधों की रचना कर रहा है । मानवीय संबंधों का सबसे बड़ा आधार यह है कि कोई स्वीकार करें, उसको प्यार करें लेकिन आज यह तत्व धीरे धीरे समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में व्यक्ति आदर्श प्यार और आदर्श संबंध की खोज मे नित नए-नए व्यक्तियों से जुड़ने का प्रयास् कर रहा है और पुराने संबंधों को तोड़ता जा रहा है चाहे यह रिश्ता माता-पिता से हो या पत्नी से, दोस्तों से। इसके पीछे वह भौतिकवादी सोच है जो की संबंधों मे भी ऊबन पैदा कर रही है।


10- आज घरों मनोरंजन के विकल्प इतने ज्यादा हो गए हैं की लोगों की एक दुसरे पर निर्भरता कम हो गयी है , लोग किसी के साथ उठ बैठ कर अनेक गेम खेलते थे और जो ख़ुशी हासिल करते थे उसको आज उन्होंने टीवी, कम्पूटर , विडिओ गेम्स आदि में ढूंढ ली है। ये सारे व्यक्तिगत मनोरंजन के साधन है . इन्टरनेट ने इसको और विस्तार दिया है . इसलिए मनुष्य के लिए मनुष्य की उपयोगिता कम और वैज्ञानिक तकनीकों पर निर्भरता बढ़ गयी है।

11- सोशल नेटवर्किंग साइट्स भी परिवारों को बिखेरने मे आज एक अहम् रोल निभा रहा है।आज लोग प्यार, विश्वास, भावनाओं आपस मे बाटने के बजाये वर्चुअल दुनिया के लोंगो मे बाँट रहे है जिनको कभी देखा नहीं है। जरा सोचिए हम मोबाइल या चैट मे दूसरे से बात मे कैसी भाषा और शब्दों का प्रयोग करते है और घर मे अपनों से कैसी भाषा और शब्दों का use करते है। और शायद यही कारण है कि जिस तकनीक ने ग्लोबल मे लोगों को एक-दूसरे के बहुत पास ला दिया है, उसी तकनीक आपस के लोंगो संबंधों मे / रिश्तों में खटास भी पैदा की है। आपसी संपर्क तेजी से टूट रहे हैं।

12- आज इंसानों का मशीनीकरण होता जा रहा है। वो इंसान कम रोबोट ज्यादा हो रहे हैं। घर माता पिता से दो महीने से भी बात नहीं की या उनसे दूर हैं तो चलेगा, लेकिन नेट कनेक्शन आधे घंटे भी नहीं मिला तो छटपटाने लगेंगे। और पूरा दिन खुद मे खोये रहते है मसलन आज लोंगो को अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए समय नहीं है। आमने सामने मिलना खत्म होता जा रहा है इसकी जगह फोन, इंटरनेट संपर्क साधने के साधन माध्यम और यंत्र बनते जा रहे हैं। अब तो किसी की मृत्यु होने का समाचार और विवाह की सुचना भी लोग ईमेल और sms से दिए जा रहे हैं। जो कि की मानवीय संबंधों के लिए घातक हो रहे है।

13- वर्चुअल दुनिया ने आज लोंगो को वास्तविक दुनिया और इसके वास्तविक रिश्तों से किनारा कर लेने को प्रेरित किया है। आज पर्सनल लाइफ भी सार्वजनिक होती जा रही है । परिवार जैसे शब्दों ने फेसबुक, वॉट्सएप से जुड़ कर एक समूह के रूप मे facebook परिवार और whats app परिवार का रूप लेना शुरु कर दिया है ऐसे मे आपसी रिश्तों में दरार आने से पारिवारिक भी रिश्ते भी टूट रहे हैं।

14- तकनीक भी अब तलाक का कारण बनती जा रही है। कई केस में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर डाली गई फोटो, कमेंट्स, लाइक्स आदि भी शक और दूरी बढऩे का कारण साबित होते हैं। पल मे गुस्सा का भाव होते ही पल भर मे सूचनाओं का आदान-प्रदान ग्लोबल परिवार मे हो जाटा है . ऐसे मे रिश्ते अपना मूल्य खोते जा रहे है और लोंगो मे इससे जन्में संदेह से आपसी प्यार और संवेदना समाप्त हो रहे हैं। मसलन जो नवविवाहित हैं, शिक्षित हैं उनमें तलाक के मामले ज्यादा दिखाई दे रहे है.

15- अक्सर देखा गया है कि किसी परिवार मे यदि दो भाई हैं, तो माएं दोनों को बराबर प्यार करती हैं , लेकिन सास बनने के बाद दोनों बहुओं पर सम भाव नहीं रह पाता है ऐसे मे , एक को बहुत मान मिलता है तो दूसरे को तिरस्कृत होना पड़ता है. जिसके कारण रोगग्रस्त आधा हिस्सा अलग होने के लिए मजबूर हो जाता है।

16- परिवार में लोग एक- दूसरे के प्रति हमारा क्या कर्त्तव्य और दायित्व के बजाये अधिकारो की बात करने लगे है । छोटों के प्रति बड़ों का क्या उत्तरदायित्व होता है और बड़ो का अपने छोटों के प्रति निष्पक्ष व्यवहार और निर्णय आदि भी पारिवारिक न्याय का मुद्दा बनते जा रहे है ।इस प्रकार परिवार मे bios उत्पन्न हो रहा है जो कि टूटन का एक महत्वपूर्ण कारण बनते जा रहे है।

17- परिवार का मूल है समर्पण । लेकिन आज बहुत छोटी- छोटी बातों को तूल देने, व्यक्तिगत अहंकार, हेकड़ी, भावनात्मक असंतुलन, अविश्वास के कारण परिवार का मूल तत्व खत्म होता जा रहा है। और ये भी एक कारण है कि घर परिवार का टूटन हो रहा है। शिक्षित पति- पत्नियों में आपसी मनमुटाव आज एक नए रूप मे दिख रहा है और नव विवाहित लड़कियों और नए परिवार सदस्यों से तो उनका तालमेल न बैठना एक आम बात होकर रह गई है। मैं और मेरा पति और उसकी कमाई की भावना आज टूटन का कारण बनती जा रही है। पति, पत्नी और इनके परिवार का ‘अहं’ काम करता है, आपसी बातचीत की कमी और समस्या को समस्या न समझने के कारण दोनों पक्ष इसी वहम में रहते हैं कि समस्या अपने आप सुलझ जायेगी जबकि ऐसा कभी नहीं होता। और धीरे धीरे समस्या इतना विकराल हो जाती है कि परिवार तो टूटता ही है धन-जन की भी क्षति होती है

18- पाश्चात्य संस्कृति में नवीन संबंधों की स्थापना और पुराने संबंधों के बिखराव को एक सामाजिक मान्यता मिली हुई है। यह सब कुछ आपसी सहमति के आधार पर अधिक तृप्ति की खोज की आशा में होता है । दूसरे शब्दों में पाश्चात्य संस्कृति की अपनी जीवन दृष्टि है , अपने जीवन मूल्य हैं और अपना एक पारिवारिक ढांचा है। जिसके लिए वहाँ के लोग अभ्यस्त हैं। वहां पर पारिवारिक सदस्यों में आपकी अपेक्षाएं भी अलग है इसलिए पारिवारिक विघटन किसी भी प्रकार तनाव बोध का कारण नहीं बनता है। इस तथ्य ने एक गतिशील परिवारिक बोध का स्वरुप धारण कर लिया है जिसे लोंगो ने स्वीकार भी कर लिया है।लेकिन भारतीय संस्कृति में इनका विकास अभी नहीं हो पाया है इसलिए यहां पर टूटन का दंश भी ज्यादे हैं।

19- धर्म और शिक्षा व्यक्ति को विनम्र बनाती है। धार्मिक व्यक्ति जहां सभी के विचारों का सम्मान करना जानते है वहीं वह अपने रूठों को मनाना भी जानते है। ऐसेपरिवार मे में प्रेम और सहयोग का भाव रहता है । परिवार के सदस्यो को मनाना और बीच का एक रास्ता निकलना एक कला है दुर्भाग्य से आज इसका अभाव हो रहा है।

20- महिलाएं आज आर्थिक रूप से शसक्त हो गयी है ऐसे मे सास बनने की स्थिति में वो किसी प्रकार से दबना नहीं चाहती । घर मे थोड़ी सी मतभेद अवस्था उनको अपने बेटे बहु से अलग रहने का निर्णय लेने को प्रेरित कर रही हैं। किसी के निर्देश या आदेश स्वीकार न करना और अलग रहना के पीछे का कारण है उनकी आर्थिक स्वतन्त्रता और व्यक्तिगत आजादी । ज्यादा आर्थिक सहयोग और बदले मे ज्यादा प्राप्ति की इच्छा इसका मूल है।

21- वैचारिक भिन्नता और कुंठा अलगाव का कारण बनती है। अक्सर पुरुष बिना कोई गलती के अपनी सत्ता मनवाने के लिए महिलाओं पर जोर जबरदस्ती करता है, जिसका परिणाम कही कही पर पारिवारिक महिला सदस्यों का मानसिक और शारीरिक हिंसा के रूप मे दिखाई देता है । परिवार टूट रहे है इसका बड़ा कारण गृह कलह भी है चुकि सामान्यतया दो इंसानों की सोच एक नहीं होती है इस सोच को एक करने के लिए किसी साधन माध्यम या यंत्र की जरूरत होती है और वह निश्चित रूप से धर्म और या समाज है। इसका अभाव भी टूटन का एक कारण है।

22- महिलाएं हमारे सदियों पुरानी समाज के पितृसत्तात्मक पद्धति को चुनौती देती हुई अपने अहंकार के कारण पति के महत्व ही भूल जाती हैं। फलतः वे अपनी परिवार के विखराव को नहीं रोक पातीं है।

23- पति के द्वारा किसी प्रकार का नशा या व्यसन का सेवन का किया जाना भी पारिवारिक हिंसा का कारण बनता है शादी के पूर्व भी ऐसे बातों का शेयर न किया अचानक पारिवारिक टूटन का कारण बनता दिख रहा है।




निष्कर्ष- कारणों को जानकर हम प्रभाव का मूल्याङ्कन कर सकते है। और कारण के निवारण से प्रभाव का निवारण भी किया जा सकता है।

टूटन के कारणों की सूची व्यक्तिगत हो सकती है इस कारण और लंबी हो सकती है । यहाँ कुछ आधारभूत बातो को ढूढने का प्रयास  किया गया है।

सबके के मूल मे यह तथ्य है मनुष्य हम होते है मानव हमें होना होता है ऐसे मे जब हम मानवीय गुणों का आत्मसात करते जायेंगे तो देवत्व की और अग्रसर होते रहेंगे और problom भी कम होती जाएगी।   इसी के साथ आप सभी की जय हो ..विजय हो ...मंगल हो...