Friday, November 4, 2016

छठ : एक लोक पर्व

छठ : एक लोक पर्व

सामान्यतया जन उसे ही स्वीकार करता है जो उसके बीच का और उस जैसा ही हो। इसीलिए आम ने सूर्य की शक्तियों और उसकी ऊर्जा का मानवीकरण छठ मैया के रूप में कर ख़ास रूप दे दिया है । भारतीय संस्कृति और लोकगीतों में छठ का यही आधारभूत रूप रंग दीखता है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि का यह दिन भगवान सूर्य को समर्पित है।

बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के निवासी इस दिन जहां भी होते हैं सूर्य भगवान की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना नहीं भूलते. यही कारण है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।

इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है इसलिए इस पर्व को महिलाओं का हठयोग भी कहा जा सकता है।

प्रारम्भ होने की मान्यताएं :-

1- भगवान राम और सीता ने सर्वप्रथम इसकी पूजा की थी । भगवान राम सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता भगवान् सूर्य थे। और जब भगवान राम लंका से रावण का वध कर सीता के साथ अयोध्या वापस लौटे । रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक अपने कुलदेवता सूर्य का आशीर्वाद पाने के लिए इन्होंने अपनी पत्नी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा। और सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज प्रारम्भ किया। तभी से आमजन इस पर्व को मना रहे है।

2- ऐसी मान्यता है कि कुंती पुत्र कर्ण को दुर्योधन ने अपना मित्र बनाकर आज का भागलपुर बिहार का राजा बना दिया। कर्ण की माता कुंती और पिता सूर्य है। और इसके पूज्य देव सूर्य थे। कर्ण इनकी उपासना नित्य कमर तक पानी में जाकर करता था और पूजा के बाद जरुरतमंदों को दान भी देता था। वर्ष मे एक बार कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य की विशेष पूजा किया करता था।  सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।

3- छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। इस प्रकार यह व्रत पारिवारिक खुशहाली के लिए किया जाता हैं। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

4- छठ पर्व को लेकर एक मान्यता यह भी है कि साधु की हत्या के प्रायश्चित के लिए जब पांडु अपनी पत्नी कुंती और मादरी के साथ वन में थे तब पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी। इससे कुंती गर्भवती हुई और उसको पुत्र प्राप्त हुआ ।आज भी संतान प्राप्ति के लिए इसका।महत्व जुड़ गया तब से यह व्रत से संतान सुख प्राप्त के लिए किया जाता है।

5- पुराणों के अनुसार मनु - प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने इसके लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ किया । इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ। मृत शिशु को छाती से लगाकर प्रियव्रत और उनकी पत्नी विलाप करने लगी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक ज्योतियुक्त विमान पृथ्वी की ओर आया जिसमे एक नारी बैठी है। देवी ने खुद को ब्रह्मा की मानस पुत्री बताया और कहा कि वो संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों संतान प्रदान करती है वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं।
देवी स्पर्श से मृत बालक जीवित हो उठा। महाराज के विनय पर देवी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो। राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की। और तभी से छठ पूजा पूत्रोंं की दीर्घ आयु के लिए मनायी जाती है। और इसे संतान प्राप्ति की इच्छा से किया जाता हैं।

सामाजिक- सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक महत्व :

1- सम्पूर्ण जगत में सूर्य एकमात्र अक्षय ऊर्जा के स्त्रोत है।और भारत मे प्रकृति पूजा यहाँ की परंपरा रही है , सूर्य की पूजा किसी भी परम्परा से बहुत- बहुत पुरानी है। यह वैदिक काल से है। लेकिन आज सूर्य का मानवीकरण किया गया है। इसका आधार हमारा कृषि आधारित समाज है।

2- सूर्य देव की उपासना ही छठ पर्व से जुड़ा है और इसक वैज्ञानिक महत्व भी है। कहा जाता है कि अस्ताचलगामी और उगते सूर्य को अर्घ देने के दौरान इसकी रोशनी के प्रभाव में आने से कोई चर्म रोग नहीं होता और इंसान निरोगी रहता है।

3- सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्य की उपासना सभी सभ्यता में देखी जा सकती है। पौराणिक काल से ही सूर्य को आरोग्य के देवता माना गया है । वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य की किरणों में कई रोगों को समाप्त करने की क्षमता पाई गई है ।

4- सूर्य पूजा का महत्व इतना अधिक किसी पूजा में नहीं मिलता. इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी हैं। कहते हैं इस दिन धरती पर सूर्य की हानिकारक विकिरण आती हैं। इससे मनुष्य जाति को कोई प्रभाव न पड़े इसलिए नियमो में बाँधकर इस व्रत को संपन्न किया जाता हैं. इससे मनुष्य स्वस्थ रहता हैं।

5- छठ पूजाअपनी सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष के कारण महत्त्व रखता है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल तंबू कनातों की जरुरत है न ही मंदिरों की और न ही इसके मूर्तियों की। बिजली के लट्टुओं की चकाचौंध, पटाखों के धमाके और शोर शराबे से दूर है यह पर्व ।

6- इस पूजा में वही चीजें चढ़ेगीं जो किसान और खेतिहर जीवन में सर्वाधिक सुलभ और आम महत्व की है। गुड़, गन्ना, सिंघाड़ा, नारियल, नींबू, हल्दी, अदरक, सुपारी, साठी का चावल, जमीरी, संतरा, मूली और सामान्य फल फूल के अलावा गाय का दूध।

7- आम जीवन मे रोज प्रयुक्त की जाने वाली चीजे खरीदी जाती है जिनका वर्ष भर प्रयोग होता है। बाँस निर्मित सूप और दौरी या बड़ी टोकरी, मिट्टी के बरतन दिए, गन्ने की पहली फसल और गन्ने से बना नया गुड़, नया धान से निकला हुआ नया चावल और उसका लड्डू और भुना लाई, कुट्टी का आटा, और गेहूँ से निर्मित प्रसाद आदि ।

8- लोक जीवन मे गाये जाने वाले लोकगीतों से युक्त होकर यह लोक जीवन की भरपूर मिठास और नया रूप प्रदान करता है । शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में रगां हुए इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पंडित पुरोहित के विधि विधान की जरूरत पड़ती है ।

9- इस पर्व मे एक पडोसी और एक पड़ोस के साथ और उसकी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। और ख़ुशी से इस पर्व के पूर्णहुति मे सहयोग करता है जिससे लोक पक्ष मजबूत होता है।

10- इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। घर के आसपास की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबंधन, तालाव या नदी किनारे पूजा की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता।

11- इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक पास पड़ोस और समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिकता के भाव से किये गए कार्य और कर्म का विराट प्रदर्शन है।


गीतों में भइया से छठ पर पूजा की मोटरी लाने का और धरती की हरयाली और सघन करने का आग्रह भी है। परदेसी पति को याद दिलाया जाता है कि घर पर छठ होने वाला है और अपनी जमीन से उखड़ने के दर्द को उत्सवधर्मिता से मिटाने का प्रयास किया गया है। पूजा के लिए लाए पके केले को सुग्गा के जूठा कर देने का गुस्सा है। लेकिन मूर्छित सुग्गे को जीवन दान के लिए सूर्य देव से आराधना और बिनती भी है कि वह जल्दी उदित हों ताकि उन्हें अ‌र्घ्य दिया जा सके।



छठ पूजा की विधि:

चार दिन का यह पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। इसे उत्तर भारत में सबसे बड़ा त्यौहार भी माना जा सकता हैं। इस पर्व मे गंगा स्नान या स्थानीय नदी या तालाब का महत्व सबसे अधिक होता हैं। जिसमे खड़े होकर यह पूजा संपन्न की जाती है। पूजा मे छठ देवी जो कि सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है।

इस पूजा को घर की महिलायें एवम पुरुष दोनों करते हैं। पत्नी बीमार है तो पति ब्रत रहते है। इसमें स्वच्छ एवं नए कपड़े पहने जाते हैं जिसमे सिलाई न की गयी हो जैसे महिलायें साड़ी एवम पुरुष धोती पहन सकते हैं। इन चार दिनों में व्रत करने वाला धरती पर सोता हैं। जरुरत पर कम्बल या चटाई का प्रयोग कर सकता हैं।
इन दिनों घर में प्याज लहसन एवम माँस मंदिरा का प्रयोग वर्जित होता है और सामान्यता खाना घर से बाहर बनाता है । सामान्य घरो मे बाटी चोखा बनता दीखता है।

यह एक चार दिवसीय त्यौहार हैं

1- नहाय खाय का यह पहला दिन होता हैं। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता हैं। इस दिन सूर्य उदय के पूर्व पवित्र नदियों का स्नान किया जाता हैं इसके बाद ही भोजन लिया जाता हैं जिसमे कद्दू खाने का महत्व है।

2- लोहंडा और खरना यह दूसरा दिन होता हैं जो कार्तिक शुक्ल की पंचमी कहलाती है। इस दिन निराहार रहते हैं रात्रि में खिरनी खाई जाती हैं और प्रसाद के रूप में सभी घर वाले इसे ही खाते है। इस दिन आस पड़ौस एवं रिश्तेदारों को भी न्यौता दिया जाता हैं।

3- संध्या अर्घ्य यह तीसरा दिन होता हैं जिसे कार्तिक शुक्ल की षष्ठी कहते हैं। इस दिन संध्या में सूर्य पूजा कर ढलते सूर्य को जल चढ़ाया जाता हैं जिसके लिए किसी नदी अथवा तालाब के किनारे जाकर टोकरी एवम सुपड़े में देने की सामग्री ली जाती हैं एवम समूह में भगवान सूर्य देव को अर्ध्य दिया जाता हैं। इस समय दान का भी दिया जाता है। इस दिन घरों में प्रसाद बनाया जाता हैं जिसमे लड्डू का अहम् स्थान होता हैं।

4- उषा अर्घ्य का यह अंतिम और चौथा दिन  सप्तमी का दिन होता हैं। इस दिन उगते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता हैं एवम प्रसाद का वितरित किया जाता हैं।

यह चार दिवसीय व्रत बहुत कठिन साधना से किया जाता हैं जिसमे साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखते है। इसे हिन्दुओ का सबसे बड़ा व्रत कहा जा सकता  हैं। इस त्यौहार पर नदी एवम तालाब के तट पर मेला लगता हैं। इसमें छठ पूजा के गीत गाये जाते हैं। जहाँ प्रसाद वितरित किया जाता हैं। और लोग ख़ास तौर पर महिलाये बिना भेद भाव के प्रसाद अपने आँचल मे मांगती भी है।

कार्तिक छठ की तरह ही चैती अथवा चैत्री छठ मनाया जाता हैं. बस तिथी में अन्तर होता हैं. दोनों ही पूजा में सूर्य देव की पूजा की जाती है।

भगवान सूर्य हम सभी के जीवन मे प्रकाश भरे।

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