Sunday, October 23, 2016

दीपावली: पाँच पर्वो का पुंज

दीपावली : पाँच पर्वो का पुंज

त्योहार या उत्सव हमारे सुख आनंद और हर्षोल्लास के प्रतीक है जो परिस्थिति के अनुसार अपने रंग-रुप और आकार में भिन्न होते हैं। त्योहार मनाने के तरीके भिन्न भिन्न हो सकते है किंतु इनका मूल अभिप्राय आनंद और  ऊर्जा प्राप्ति ही होता है।

लगभग सभी त्योहारों का कोई न कोई पौराणिक महत्व है जिनका अधिकतर भाग आस्था से जुड़ा होता है। यह संभव हो पौराणिक कथाएं प्रतीकात्मक महत्व की हो क्यों कि इनका मकसद सामाजिक व्यवस्था का नियमन एवं संचालन होता है।

कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इसे दीवाली भी कहते है।

वास्तव मे दीवाली सिर्फ एक दिन का त्योहार न होकर, त्योहारों की एक श्रृंखला है। जिसके साथ पांच पर्वों जुड़े हैं। जो कि दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।

सभी पर्वों की अलग अलग धार्मिक, पौराणिक महत्त्व है ।जिसके पीछे अलग अलग दंत-कथाएं भी है ।

भारत में दीपावाली त्यौहार का महत्व

1- हिन्दू मान्यता के अनुसार दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास को खत्म कर घर लौटे थे। अपने प्रिय राजा के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए थे। तब से लेकर आज तक यह प्रकाश-पर्व के रूप मे भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है।

2- भारतीय परंपरा मे ये मान्यता है कि सत्य की सदा जीत होती है। दीपावली का वास्तविक भाव भी यही है ।
असतो मा सद्गगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय। इस प्रकार दीपावली व्यक्ति को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व है। आज भी प्रत्येक दीपावली के दिन एक दीपक से ही दूसरा दीपक जलाया जाता है और इन दीपों से निकलने वाला यह प्रकाश सदियों  से व्यक्ति और उसके समाज को शांति व भाइचारे का संदेश देता आ रही है।  दिवाली अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन लोग आपसी दुश्मनी दूर करने और प्यार और दोस्ती को बढाने के लिये इस दिन मिठाई और उपहार वितरित करते है।


3- कृष्णपंथ के मतानुयायी मानते है कि इस दिन द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण ने चतुर्दशी (दिवाली से एक दिन पहले) को बुराई के प्रतीक राक्षस नरकासुर के ऊपर विजय की थी जिसके उपलक्ष्य में दिवाली को मनाया जाता है।

4- यह पांडवो के 12 वर्ष के निष्कासन के साथ साथ 1 वर्ष के अज्ञातवास अर्थात् छुप कर रहना से वापस घर आने के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है।

5- एक पौराणिक मान्यता के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था

6- जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने 527 ई0पू0 मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति किया था जिसके उपलक्ष्य में यह पर्व मनाया जाता है, और आर्य समाजवादियों द्वारा महावीर स्वामी की मृत्यु की वर्षगांठ या शरदीया नव-शयष्टी के रुप में मनाया जाता है।

7- सिक्ख धर्म मे भी अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और इस दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द जी को जेल से रिहा किया गया था।

8- हिन्दू कलैण्डर के अनुसार दिवाली (अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष का अन्तिम दिन) पर मारवाङी अपना नया साल मनाते है।

9- गुजराती भी चन्द्र कलैण्डर (कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष के पहले दिन) के अनुसार दिवाली से एक दिन बाद अपना नया साल मनाते है।


10- आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दीपावली बंधनसे मुक्ति का दिन है। व्यक्ति के अंदर अज्ञानरूप अंधकार का साम्राज्य है। दीपक को आत्म ज्योति का प्रतीक भी माना जाता है। अतः दीप जलाने का तात्पर्य है- अपने अंतर को ज्ञान के प्रकाश से भर लेना, जिससे हृदय और मन जगमगा उठे। इस दिन चतुर्दिक तमस् में ज्योति की आभा फैलती एवं बिखरती है। अंधकार से सतत् प्रकाश की ओर बढ़ते रहना ही इस महापर्व की प्रेरणा है। इसलिए सभी स्थानों पर सरसो के तेल के दीयें जलाने से बुरी ऊर्जा जल कर नष्ट होगी और अच्छी ऊर्जा आकर्षित होगी। इस प्रकार आध्यात्मिकता की दृष्टि से यह जागरूकता और भीतर के प्रकाश के जश्न का त्यौहार है।

शुद्ध आत्मा, समृद्धि और भगवान के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिये अपने अंदर और बाहर जैसे घरों, कार्यालयों और अन्य काम के स्थानों की साफ सफाई और रंगरोगन का त्यौहार है। साल भर की गन्दगी की घर से बाहर निकलने से नकारात्मक ऊर्जा की समाप्ति के साथ सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

बुराई को दूर करने के लिए लोग बहुत तेज ध्वनि करते है और हर जगह रोशनी का प्रयोग करने है इसका अपना एक विशेष महत्व है।

लोग पूरे वर्ष के लिए अच्छा स्वास्थ्य, धन, ज्ञान, शांति, समृद्धि प्राप्त करने के मिथक में पटाखों का प्रयोग करते है। इनका प्रयोग से उच्च श्रेणी विभिन्न फ्रीकेन्सी की ध्वनि निकलती है जो कि लोगों की असली खुशी का संकेत है। दूसरी ओर पटाखों से निकला धूआ बरसात के मौसम के बाद उत्पन्न हुये बहुत से कीडों को मारता है। लेकिन आज यह तेज आवाज और खतरनाक पटाखों का उत्सव बनता जा रहा है लेकिन दिवाली पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का पर्व नहीं है।

लेकिन दीवाली त्योहार का मतलब सिर्फ पटाखा फोड़ना नहीं होता है। जरा सोचिए पटाखों के कारण कितने दमें के मरीज खाँसते-खाँसते बीमार हो जाते है । कितने ही घरों में आग लग जाती है और कितने लोग पटाखों के कारण घायल और मृत हो जाते है।

वास्तव  मे  दिवाली पर्व है प्रकाश का । यह पर्व समाज से अंधकार को समाप्त कर उल्लास, भाईचारे व प्रेम का संदेश फैलाने की प्रेरणा देता है न कि खतरनाक पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का। यह पर्व है साफसफाई और घरों को सजाने का । लोग अपने घर और ह्रदय को  आशीर्वाद, बुद्धि और धन का स्वागत करने के लिये गन्दगी बाहर निकलते है।  सजाते है.  रंगोली बनाते है, दरवाजे पर पर्दे लगाते है, इस दिन देवी लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा करते है।

11- दीवाली का पर्व लक्ष्मी जयंती का पर्व भी है। कमला जयंती, लक्ष्मी जयंती के लिये भी प्रसिद्ध है। लक्ष्मी का संबंध सुख, संपत्ति, समृद्धि, वैभव आदि से है।

दीपावली का सीधा संबंध लक्ष्मी पूजा के रूप में है। समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकले थे, जिनमें पहले रत्न लक्ष्मी अर्थात् ‘श्री’ के प्रकट होने की कहानी है ।पौराणिक महत्व के साथ यह एक व्यावहारिक सच्चाई भी है कि लक्ष्मी की प्रसन्नता सभी के लिए अभीष्ट है। धन वैभव हर किसी को चाहिए। इसलिए उसी अधिष्ठात्री शक्ति की पूजा-आराधना के लिए दीपावली का महापर्व व्यापक रूप से प्रचलित है।

व्यापारी वर्ग दीवाली की प्रतीक्षा में पूरा वर्ष लगा देता है ऐसी मान्यता है कि यदि दीवाली अच्छी हो जाए, तो वह पूरे साल के लिए अच्छे आने का संकेत भी बन जाती है

साथ ही इसका सम्बन्ध व्यापार से भी है। भारत के व्यापारी इसी दिन धन की देवी लक्ष्मी जी का आह्वान करते हुए नए "बही खाते" की शुरुआत करते हैं। इस प्रकार दीवाली से नये व्यापार प्रारम्भ की शुरुआत भी होती है।  यह हर आदमी में, हर तरह से, नये उत्साह का संचार भी करती है।

12- दीवाली पर्व का जिक्र तंत्र ग्रंथों में मिलता है। यह पर्व खास तौर से तांत्रिकों, शक्तियों के अर्जन का पर्व है। दस महाविद्याओं में लक्ष्मी पूजन का जिक्र है। इसलिए दीवाली का पर्व शाक्तों का पर्व भी कहा जाता है। शाक्त वे लोग होते हैं, जो मूलतः शक्ति के उपासक होते हैं। वे शक्ति की पूजा कर के अपनी अंतर्निहित शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं।

13- यह पर्व ज्ञान, विवेक एवं मित्रता की लौ जलाने का भी पर्व है । दक्षिण भारत की परंपरा में दीवाली उत्सव की ऐसी मान्यता है ।

हिंदू पुराणों के अनुसार राजा बली एक दयालु दैत्यराज था। वह इतना शक्तिशाली था कि वह स्वर्ग के देवताओं व उनके राज्य के लिए खतरा बन गया। बली की ताकत को खत्म करने के लिए ही भगवान विष्णु एक बौने भिक्षुक ब्राह्मण के रूप में चतुराई से राजा बली से तीन पग के बराबर भूमि मांगी। राजा बली ने खुशी के साथ यह दान दे दिया। राजा बली को कपट से फंसाने के बाद जब भगवान विष्णु ने स्वयं को प्रभु के स्वरूप में पूर्ण वैभव के साथ प्रकट करते हुए अपने पहले पैर से ‘स्वर्ग' व दूसरे पग से ‘पृथ्वी' को नाप लिया तब राजा बली को वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने आत्म समर्पण करते हुए अपना शीश अर्पित करते हुए भगवान विष्णु को अपना तीसरा पग उस पर रखने के लिए आमंत्रित किया। भगवान विष्णु ने अपने अगले पग से उसे अधोलोक में धकेल दिया लेकिन इसके बदले में भगवान विष्णु ने राजा बली को समाज से अंधकार को दूर करने के लिए उसे ज्ञान का दीपक प्रदान किया। उन्होंने उसे यह आशीर्वाद भी दिया कि वह वर्ष में एक बार अपनी जनता के पास अपने एक दीपक से लाखों दीपक जलाने के लिए आएगा ताकि दीपावली की अंधेरी रात से अज्ञान, लोभ, ईर्ष्या, कामना, क्रोध, अहंकार और आलस्य के अंधकार को दूर करते हुए सभी में ज्ञान, विवेक और मित्रता की लौ जलाई जा सके।

 14-  दिवाली पर जुआ खेलने के रिवाज का भी महत्व है। लोगो को विश्वास है कि इस दिन देवी पार्वती और भगवान शिव ने जुआ पासों से खेले थे। इसी मिथक के साथ पूरे वर्ष समृद्धि पाने के लिये दिवाली की रात इस खेल को खेलते है।

पाँच पर्व का महत्त्व

1- धनतेरस

दीपावली रूपी  महापर्व आरम्भ स्वास्थ्य चेतना जगाने के साथ शुरू होता है। दीवाली का शुभारंभ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होता है। इसे धनतेरस कहा जाता है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि की आराधना की जाती है। वस्तुतः यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है।

महर्षि धन्वंतरी को आयुर्वेद व स्वस्थ जीवन प्रदान करने वाले देवता के रूप में भी पूजनीय है, जैसे धन-वैभव के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं, उसी प्रकार स्वस्थ जीवन के लिए स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरी की आराधना की जाती है।

धनतेरस की सायंकाल को यमदेव निमित्त दीपदान किया जाता है। ऐसा करने से यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। मान्यता है कि यदि गृहलक्ष्मी इस दिन दीपदान करें तो पूरे परिवार को रोग-मुक्ति मिलती है और पूरा परिवार स्वस्थ रहता है।

इस दिन पीतल और चाँदी खरीदने चाहिए। पीतल भगवान धन्वंतरी की धातु है। पीतल खरीदने से घर में आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।इस दिन चांदी खरीदने की भी परंपरा है। चांदी को चन्द्रमा का प्रतीक मानते हैं जो शीतलता प्रदान करती है जिससे मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। चाँदी कुबेर की धातु है। इस दिन चाँदी खरीदने से घर में यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और संपदा में वृद्धि होती है।

व्यापारी वर्ग इस दिन नए बहीखाते खरीदता है और इन्हें गद्दी पर स्थापित करते है। तत्पश्चात दिवाली पर इनका पूजन किया जाता है। इस प्रकार देवी लक्ष्मीजी के आह्वान का भी यही दिन होता है।

देवताओं के वैद्य माने जाने वाले धन्वन्तरि, चिकित्सा के भी देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए भी धनतेरस का विशेष महत्व है।

आयुर्वेद चिकित्सक अपने चिकित्सालय पर धनतेरस के दिन धन्वंतरी देव की विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। पुरातनकाल से अधिकांश आयुर्वेदिक औषधियों का इसी दिन निर्माण और अभिमंत्रित करने का भी प्रचलन है।

धार्मिक व पौराणिक मान्यता यह है कि सागर मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश के साथ अवतरित हुए थे और इस घटना के प्रतीक स्वरूप ही बर्तन खरीदने की परम्परा का प्रचलन हुआ। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन चल या अचल संपत्ति खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है।

पौराणिक मान्यता यह है कि माँ लक्ष्मी को विष्णु जी का श्राप दिया था कि उन्हें 13 वर्षों तक किसान के घर में रहना होगा। श्राप के दौरान किसान का घर धनसंपदा से भर गया। लेकिन श्राप से मुक्ति के उपरांत जब विष्णुजी लक्ष्मी को लेने आए तब किसान ने उन्हें रोकना चाहा। लक्ष्मीजी ने कहा कल त्रयोदशी है तुम साफ-सफाई करना, दीप जलाना और मेरा आह्वान करना। किसान ने ऐसा ही किया और लक्ष्मी की फिर से कृपा प्राप्त हुई । तभी से लक्ष्मी पूजन की प्रथा का प्रचलन आरंभ हुआ।

धन तेरस के दिनखेती करने वाले किसान धनिये के बीज खरीदते हैं। दिवाली के बाद इन बीजों को वे अपने खेतों में बो देते हैं। ग्रामीण इलाकों में इस दिन  लोग अपने पशुओं की पूजा करते हैं क्यों की यह आजीविका चलाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन मानते परंपरागत काल मे थे।

धनतेरस की सांय घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जला कर देवी लक्ष्मी का आह्वान करते है और इसी के साथ दीपावली का शुभारंभ होता है। दिवाली के पहले दिन का संबंध धन वैभव और सम्पदा से जोड़ा गया है।

2- नरक चतुर्दशी

दूसरे दिन चतुर्दशी को नरक-चौदस मनाया जाता है। इसे छोटी दीवाली भी कहा जाता है। इस दिन एक पुराने दीपक में सरसों का तेल व पाँच अन्न के दाने डाल कर इसे घर की नाली ओर जलाकर रखा जाता है। यह दीपक यम दीपक कहलाता है।

इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करना चाहिए और उसके बाद भगवन विष्णु और कृष्ण के दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।अर्थात यह दिन अपने रूप-रंग को संवारने की भी मान्यता लिए है।

इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं.

इसके पीछे एक पौराणिक कथा हैं ।


एक प्रतापी राजा थे जिनका नाम रन्ति देव था । स्वभाव से बहुत ही शांत एवम पुण्य आत्मा, इन्होने कभी भी गलती से भी किसी का अहित नहीं किया । अपनी मृत्यु के समय जब इन्होंने यम दूत को देखा तो इन्हें पता चला कि इन्हें मोक्ष नहीं बल्कि नरक मिला हैं । तब उन्होंने पूछा कि जब मैंने कोई पाप नहीं किया तो मुझे नरक क्यूँ भोगना पड़ रहा हैं । उन्होंने यमदूतों से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया एक बार अज्ञानवश आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा चला गया था | उसी के कारण आपका नरक योग हैं । तब राजा रन्ति से हाथ जोड़कर यमराज से कुछ समय देने को कहा ताकि वे अपनी करनी सुधार सके ।उनके अच्छे आचरण के कारण उन्हें यह मौका मिला। तब राजा रन्ति ने अपने गुरु के पास गए । गुरु ने उन्हें सलाह दी कि वे हजार ब्राह्मणों को भोज कराये और उनसे क्षमा मांगे । उनके इस कार्य से सभी ब्राह्मण प्रसन्न हुए और उनके आशीर्वाद के फल से रन्ति देव को मोक्ष मिला ।वह दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस का था, इसलिए इस दिन को नरक निवारण चतुर्दशी कहते है।

नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। पौराणिक कहानी के अनुसार एक हिरण्यगर्भ नामक एक राजा थे जिन्होंने अपना राज पाठ छोड़कर तप में अपना जीवन व्यतीत करने का निर्णय किया । उन्होंने कई वर्षो तक जंगल मे तपस्या की, लेकिन उनके शरीर पर कीड़े लग गए और शरीर काले और सड़ गया सा दिखने लगा। जिसके कारण राजा बहुत दुःख थे उन्होंने इससे निजात पाने के लिए नारद मुनि से अपनी व्यथा कही । तब नारद मुनि ने इसका कारण बताया कि आप योग साधना के दौरान शरीर की स्थिती सही नहीं रखते इसलिए ऐसा परिणाम सामने आया और निवारण कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगा कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करे साथ ही रूप के देवता श्री कृष्ण की पूजा कर उनकी आरती करे, इससे आपको पुन: खोया हुआ सौन्दर्य प्राप्त होगा। राजा नै यही कर अपने शरीर को स्वस्थ किया। इस प्रकार इस दिन को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं ।

चूकि नरक चतुर्दशी दिवाली के एक दिन पहले मनाया जाता हैं जिसमे इसमें भी द्वार पर दीपक जलाये जाते है । इसी कारण इसे छोटी दीवाली कहते हैं ।

नरक चतुर्दशी हनुमान जयंती के रूप मे भी मनायी जाती है। ऐसी मान्यता हैं कि इस दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस के दिन हनुमान जी ने माता अंजना के गर्भ से जन्म लिया था । अतः इस दिन दुखों एवम कष्टों से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की पूजा की जाती हैं जिसमे कई लोग हनुमान चालीसा, हनुमानअष्टक का पाठ किया जाता है।


3- दीपावली

तीसरे दिन अमावस्या को दीवाली का त्योहार पूरे भारतवर्ष के अतिरिक्त विश्वभर में बसे भारतीय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है। यह भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न तरीकों से मनाया जाता है।

4- अन्नकूट या गोवर्धन पूजा

दीवाली के पश्चात अगले दिन अन्नकूट मनाया जाता है। यह दीवाली की श्रृंखला में चौथा उत्सव होता है जो कि कार्तिक माह की प्रतिपदा तिथि के दौरान मनाया जाता है।

हिन्दु कैलेण्डर में गोवर्धन पूजा का दिन अमावस्या तिथि के एक दिन पहले भी पड़ सकता है। इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र देवता को पराजित किये जाने की मान्यता है । इसलिए लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं।

यह दिवस यह सन्देश देता हैं कि हमारा जीवन मे  प्रकृति प्रदत्त हर एक चीज़  महत्वपूर्ण है जिस  पर  हमारा जीबन निर्भर करता हैं । प्रकृति प्रदत्त चीजे जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, नदी और पर्वत आदि से हमारा जीबन चलता है इसलिए हमें उन सभी  धन्यवाद देना चाहिये | इस प्रकार यह पर्व इन सभी प्राकृतिक धन सम्पति के प्रति हमारी नमन की भावना को व्यक्त करता हैं |

इस दिन विशेष रूप से गाय माता की पूजा का महत्व होता हैं | उनके दूध, घी, छांछ, दही, मक्खन यहाँ तक की गोबर एवम मूत्र से भी मानव जाति का कल्याण हुआ हैं | ऐसे में गाय की इस दिन पूजा की जाती है।

इस दिन गोधन कूटने की प्रथा है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियां घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं। दोपहर पर्यन्त यह सब करके बहन भाई पूजा विधान से इस पर्व को प्रसन्नता से मनाते हैं।

गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। इस दिन गेहूँ, चावल जैसे अनाज, बेसन से बनी कढ़ी और पत्ते वाली सब्जियों से बने भोजन को पकाया जाता है और भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है। आज कई जगहों में इसने विशाल भोज का स्वरुप धारण कर लिया है आज कल इसे आधुनिक युग में पार्टी की तरह मनाया जाने लगा गया है।

महाराष्ट्र में यह दिन बालि प्रतिपदा या बालि पड़वा के रूप में मनाया जाता है। वामन जो कि भगवान विष्णु के एक अवतार है, उनकी राजा बालि पर विजय और बाद में बालि को पाताल लोक भेजने के कारण इस दिन उनका स्मरण किया जाता है। यह माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बालि इस दिन पातल लोक से पृथ्वी लोक आता है।

गोवर्धन पूजा का दिन गुजराती नव वर्ष के दिन के साथ भी जुड़ता है जो कि कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष के दौरान मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा उत्सव गुजराती नव वर्ष के दिन के एक दिन पहले मनाया जा सकता है।

ऐसी मान्यता है कि कुछ भी हो जाए, इस दिन खुश रहना चाहिए क्यों कि यदि कोई किसी भी कारण से दु:खी या अप्रसन्‍न रहता है, तो वर्ष भर दु:खी ही रहता है। इसलिए यह पर्व प्रसन्‍नता / ख़ुशी का दिन भी कहा जा सकता है।

ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन स्नान से पूर्व पूरे शरीर में सरसों का तेल लगाकर स्‍नान करने से आयु व आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा दु:ख व दरिद्रता का नाश होता है।



5- भैया दूज

हिन्दू धर्म में भाई-बहन के स्नेह-प्रतीक दो त्योहार मनाये जाते हैं -

एक रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है।

दूसरा त्योहार, 'भाई दूज' का होता है।

दिवाली के दो दिन बाद शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है।
इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनके लम्बे और स्वस्थ तथा सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं और भाई अपनी बहनों को उपहार प्रदान करते हैं। भाई दूज का यह त्योहार भाई बहन के स्नेह और प्रेम के पवित्र भाव को सुदृढ़ करता है।

इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। और बहनें भाइयों को तेल लगाकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। यदि गंगा यमुना में नहीं नहाया जा सके तो भाई को बहन के घर नहाना चाहिए। इसका लक्ष्य भाई की उम्र बढ़ना और जीवन के कष्ट दूर करना है।

इस दिन बहन के घर भोजन मे चावल का सेवन करने का विशेष महत्व है। बहन चचेरी अथवा ममेरी कोई भी हो सकती है। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि किसी स्त्रीलिंग पदार्थ का ध्यान करके या उसके पास बैठ कर भोजन करना शुभ माना जाता है।

भारत मे त्यौहार का लक्ष्य प्रेम के रिश्ते को और बढ़ाना है। कई पौराणिक कथाओं से सिद्ध हुआ हैं कि भाई बहन का रिश्ता सदैव एक दुसरे में प्राण न्यौछावर के लिए तैयार रहता हैं. भाई दूज की परंपरा में ऐसी ही मान्यता हैं, जिसमे बहन अपने भाई की सारी विपत्तियों को पहले स्वयं पर लेती हैं. अपने भाई की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करती हैं और बदले में उससे कुछ नहीं मांगती।



निष्कर्ष -

इस प्रकार आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक और बौद्धिक लाभ और परम लाभ पहुचाने वाले उत्सवों का नाम है दिवाली का उत्सव।

इसमे सामाजिकता को आध्यात्मीकता से जोड़ा गया है।
इसमे खुशी को आनंद से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को समाज से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को लोक से जोड़ा गया है।
इसमे छोटो और बड़ो दोनों को जोड़ा गया है।
इसमे स्वास्थ्य को सम्पदा से प्राथमिक मान  कर जोड़ा गया है।
इसमे सुख को स्वास्थ्य से जोड़ा गया है।
इसमें व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य को पशुओं से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य की मनुष्य से जोड़ा गया है। 
मनुष्य को उसके देवत्व से जोड़ा गया है
इसमे कुछ चीजो को बाहर निकलने और कुछ चीजो को अंदर लाने से जोड़ा गया है।
इसमे बाह्य और आतंरिक दोनों को प्रकाशित करने पर बल दिया गया है
आइये इसी रूप मे प्राकृतिक रूप से दीपावली मनाये ..

आप सभी को  प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ।

आप सभी की जय हो ..दुखो और कष्टों पर विजय मिले । जीबन का हर पल प्रकाश से आलोकित हो
हर सांस मे व्यक्ति और समाज का  मंगल हो.----

Thursday, October 20, 2016

पानी बचाने के 11 कारगर तरीके

save water के 11 कारगर तरीके!!

जल बिन सब जल जाता है। इसलिए जल को जीवन की संज्ञा दी जाती है।

जल की कमी आज एक भयानक problom बनती जा रही है और ग्लोबल तनाव का यह एक कारण भी ।

सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे आसपास ही नहीं पूरे विश्व मे स्वच्क्ष पानी की कमी है। ऐसे मे हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि पानी की बचत करे। ऐसे ही एक दिन जब 24  घण्टे से ऊपर विद्युत नहीं थी तो पानी की प्रॉब्लम  उत्पन्न हो गयी।  फिर पर सतत बिचार और उन विचारो का क्रियान्यवन शुरू किया।इसका ही अनुभव शेयर कर रहा हूँ,

हमें बहुत सारा पानी बचाने के लिए  बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं है । हमें सिर्फ अपनी आदतों मे छोटी छोटी बातों मे ध्यान देकर छोटा छोटा   बदलाव करने की जरूरत है और सचेत रहने की जरुरत है।

1- सबसे पहले बाथरूम में घर के नलों में टिप टिप कर पानी रिसने वाले नलों को बदल देना चाहिए । थोड़ी सी खराब टोटी लगभग दिन भर में करीब 1 से दो बाल्टी पानी का रिसाव कर सकती है। इसलिए जरूरी है कि पानी बचाने के लिए खराब नल या या नल के वासर को बदल दिया जाए ।

2- खराब फ्लस के कारण हर महीने हजारों लीटर पानी बर्बाद होता है । एक बार फ्लस करने मे करने में करीब 6 से 7 लीटर पानी का use होता है । अतः जरूरी है कि पानी बचाने के लिए फ्लस की जगह पानी की बाल्टी का प्रयोग करें । अगर यह संभव नहीं है फ्लस के बॉक्स में पुरानी यूज़ की हुई बोतल मे एक बोतल पानी भरकर रख दे । इस तरह है हर बार फ्लस मे करीब 1 लीटर पानी की बचत की जा सकती है और अगर घर के 5 सदस्य 2 टाइम फ्लस use करते है तो 10 से 15 लीटर पानी औसत रूप से बचाया जा सकता है।

3- आजकल हर घर में water filter रखने का चलन सा हो गया है इसकी सबसे बड़ी अच्छाई है कि पीने को स्वच्छ् पानी मिलता है इसका दूसरा पहलू ये है कि 1 लीटर का शुद्ध पानी देने में करीब यह 3 से 4 लीटर तक पानी प्रयुक्त करता है । 1 दिन में 10 लीटर शुद्ध पानी बनाने में 35 - 40 लीटर पानी खर्च करता है । और अधिकतर घरों मे यह पानी यूँ ही नालियो मे बहा दिया जाता है ।इस प्रकार महीने का आकलन किया जा सकता हैं कि कितना पानी बह जाता है । अतः जरूरी है कि हम इस पानी को बाल्टी मे रोक कर इक्कठा करे। और इस बाल्टी के पानी का प्रयोग हम बर्तन धोने, पौधों की सिंचाई , फ्लस करने, पोछा लगाने, आदि सामान्य कार्यो मे प्रयोग कर सकते हैं ।

4- कपड़े 1 धुलना हो या 6-7, वाशिंग मशीन से धुलाई करने पर पानी उतना ही पानी खर्च होगा इसलिए जरूरी है कि वाशिंग मशीन का प्रयोग करें जब 8 से 10 कपड़ो को एक साथ धुला जाना हो । कपड़े को खंगालने के लिए वाशिंग मशीन के बजाय बाल्टी में पानी का प्रयोग करें इस तरह वाशिंग मशीन में कपड़ों की धुलाई से महीने में हजार लिटर पानी बचा सकते हैं ।

5- बाइक या कार को पाइप से पानी डालकर धुलने में बहुत सारा पानी खर्च होता है जबकि अगर हम एक बाल्टी में आधा बाल्टी पानी लेकर कार की धुलाई करें और थोड़ी सा शारीरिक श्रम करें तो इस धुलाई में 50 से 300 लीटर तक पानी बचा सकते हैं ।

6- अक्सर घर मे नल या सिंक में बर्तन धुलने में काफी पानी खर्च होता है । तो जरूरी है कि हम दोहरे खाने वाले सिंक का प्रयोग करें । अगर ऐसा संभव ना हो तो बर्तन धुलने के लिए टब प्रयोग कर एक बार में करीब 15 से 20 लीटर पानी की बचत की जा सकती है ।

7- नहाते समय हम अक्सर shower की जगह बाल्टी में पानी नल भर bath करें तो हम बहुत सारे पानी की बचत कर सकते हैं । बाल्टी से नहाने में एक या दो बाल्टी पानी से नहा कर करीब एक बार मे एक व्यक्ति के द्वारा करीब 20 लीटर पानी के हिसाब से 4 व्यक्तियों के द्वारा 100 टन पानी की बचत कर सकते हैं ।

8- अक्सर शेव करते समय हम bashing का नल खुला छोड़ देते है । इस आदत से बचने के लिए जरूरी है कि हम mug में पानी लेकर सेविंग करें । इससे हम हर बार में 4 से 5 लीटर पानी बचा सकते हैं । क्यों की मग या जग मे पानी लेकर सेविंग करने में अधिकतम 1 से 2 लीटर पानी प्रयोग में होगा ।

9 - सब्जी धुलने के लिए छोटी बाल्टी का प्रयोग करे और इस प्रयुक्त पानी को पौधों मे प्रयोग कर सकते है इस तरह हर दिन 10 से 15 लीटर पानी की बचत की जा सकती है।
घर के फर्श की धुलने के बजाये पोछा लगाने की बरीयता देना चाहिए । पोछा लगाने मे सिर्फ आधा बाल्टी पानी का प्रयोग होगा जब धुलने मे 50 से 70 लीटर पानी का प्रयोग हो सकता है।

10- पानी की टंकी मे सामान्य सा फुल होने पर बजने वाला इंडिकेटर/ alarm लगाए . 150 से 200 रूपये खर्च कर आप करीब टंकी ful होने से पानी बहने से बच सकते है और 40 से 50 लीटर पानी को बर्बाद होने से बचा सकते है।
इसमे अलार्म मे और बिजली की WAIR  जोड़ कर तार के दोनों सिरे  तार ऐसे पानी की टंकी मे डालना है कि इनकी आपस की दुरी २-३ इंच बनी  रहे  । और जब आप पानी का पंप on करगे तो साथ मे इस अलार्म को भी on कर दे ...पानी की टंकी भर गयी है -अलार्म बजने पर इसे बंद कर दे।
https://www.amazon.in/dp/B019YGK6AY/ref=cm_sw_r_wa_apa_BLF.xbBYYP8C
 इस अलार्म करने के बारे मे कुछ कहना नहीं है ,मैं  खुद १ साल से प्रयोग कर रहा हूँ।  आप चाहे तो ऐसा अलार्म कही से भी खरीद सकते है


11- बरसात मे बहुत सारा पानी बह जाता है । इसके लिए water harvesting तरीको का प्रयोग कर सकते है । सामान्य सा उपाय है कि छतों से इस पानी की एक groung tank मे इकठ्ठा किया जाए और जरुरत पर इसका use किया जाए।
अक्सर हम यह calculation एक व्यक्ति को count कर लगाते है। 4 से 5 व्यक्तयो के परिवार के लिए ये बचत बहुत ज्यादे होगी।



निष्कर्ष - कहते है आज की बचत कल की सुरक्षा। जल की बचत कर हम चहुमुखी लाभ का कार्य कर सकते है

1) हम खुद के बजट के expense यानि पानी के बिल मे कमी कर सकते है और बचत कर सकते है । इस indirect बचाये हुए धन को हम कही और प्रयोग कर सकते है।

2) हम indirect तरीके से अपने देश की सेवा कर सकते है । अपने देश के प्रति अपने duties को निभा सकते है।और अपने देश के save water अभियान का एक हिस्सा बन सकते है। जिसकी chain ग्लोबल होती जा रही है।

3) जब हम जल संसाधन की रक्षा करते है तो एक प्रकार से environment के protection मे भी भागीदारी करते है।

4) इस सबके साथ हम एक example पेश करते है और दूसरों को भी इस कार्य के लिए motivate कर सकते है।

...........Save water........

Sunday, October 16, 2016

अरुणिमा सिन्हा : संघर्ष की जीवित प्रतिमूर्ति

अरुणिमा सिन्हा : संघर्ष की जीवित प्रतिमूर्ति

जीवन प्रतिकूलताओं का संजाल है इसी कारण जीबन मे संघर्ष भी है यह संघर्ष ही हमें सामर्थ्यवान और महान बनाता है ।

चाहे राम हो पांडव सभी ने सुख का त्याग कर दुःख झेला है इसी कारण वो आज नायक कहे जाते है ।

ऐसी ही एक एक नायक है अरुणिमा सिन्हा जिनके जीवन ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया है और संघर्ष करने की प्रेरणा दे रहा है और आगे भी प्रेरणा देता रहेगा।

भारत की अरुणिमा सिन्हा ने इसी साल जुलाई मे इंडोनेशिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पुंकाक जया पर तिरंगा फहराने में सफलता प्राप्त की है । अचानक जब इस न्यूज़ को अख़बार मे पढ़ा तो जेहन मे पांच साल पहले की एक घटना दिमाग मे घूम गयी कि कही ये वही लड़की तो नहीं है। या कही वो लड़की तो नहीं है जिसने २-३ साल पहले हिमालय पर्वत पर चढ़ाई की थी

कौन है अरुणिमा सिन्हा -

उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर के शाहजादपुर इलाके के पंडाटोला मुहल्ला के एक छोटे-से मकान में रहने वाली अरुणिमा सिन्हा के बचपन से ही जीवन का बस एक ही लक्ष्य थाः भारत को वॉलीबॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना. इसके लिए के उन्होंने कक्षा 6 से ही प्रयास करना शुरू कर दिया। साथ साथ पढाई भी जारी रखी। समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री लेने के साथ अरुणिमा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाने लगीं.

इसी बीच 11 अप्रैल, 2011 की एक घटना ने उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी. . जब पद्मावत एक्सप्रेस से वह दिल्ली जा रही थीं। बरेली के पास कुछ अज्ञात बदमाशों ने उनके डिब्बे में प्रवेश किया।

अरुणिमा को अकेला पाकर वे उनकी चेन छीनने लगे। छीना-झपटी के बीच बदमाशों ने उन्हें ट्रेन से नीचे फेक दिया। जिससे उनका बांया पैर कट गया।

लगभग सात घण्टों तक वे बेहोशी की हालत में वही पड़ी रही और तड़पती रहीं। सुबह टहलने निकले कुछ लोगों ने जब पटरी के किनारे अरुणिमा को बेहोशी की हालत में पाया तो तुरंत अस्पताल पहुंचाया। और वहां से दिल्‍ली के एम्‍स में भर्ती कराया गया। एम्स में इलाज के दौरान उनका बाया पैर काट दिया गया।

लोंगो को लगा की बास्‍केट बॉल की राष्‍ट्रीय स्‍तर की खिलाड़ी के रूप मे यह लड़की अब अपने जीवन में कुछ नहीं कर पायेगी। लेकिन उन्होंने जि़न्दगी से हार नहीं मानी और जीबन को एक खेल मान कर फिर से उठ खड़ी हुई।

आगे एम्स  मे बिताये हुए इन चार महीनो ने अरुणिमा की सोच , साहस और हौसला को और भी मजबूत किया और विश्व की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट को फतह करने का एक नया संकल्प लिया।

इस संकल्प को मूर्त रूप देने के लिए अरुणिमा एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली महिला पर्वतारोही बछेंद्रीपाल से मिलने जमशेदपुर पहुंची ।

और अपने लक्ष्य पर कार्य शुरू किया। बछेंद्रीपाल की देखरेख में नेपाल , लेह , लद्दाख मे पर्वतारोहण के गुण सीखे |उत्तराखंड के नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनिंग और टाटा स्टील के प्रशिक्षण लेने के बाद 1 अप्रैल 2013 को उन्होंने एवेरेस्ट की चढ़ाई शुरू की और 52 दिन के बाद 21 मई को वे एवरेस्ट की चोटी फतह करने वाली पहली महिला विकलांग / दिव्यांक पर्वतारोही बनी |

अरुणिमा का मानना  है विकलांगता व्यक्ति की सोच में होती है। हर किसी के जीवन में पहाड़ से ऊंची
कठीनाइयां आती हैं, जिस दिन वह अपनी कमजोरियों को ताकत बनाना शुरू करेगा उस दिन हर ऊँचाई बौनी साबित होगी। अरुणिमा ने  इस साबित भी किया। 

अरुणिमा सिन्हा यहीं नहीं रुकी इसी क्रम में वे अफ्रीका की किलिमंजारो और यूरोप की अल्ब्रुस चोटी पर तिरंगा फहराया |

अरुणिमा ने केवल पर्वतारोहण , बल्कि आर्टिफिसियल ब्लेड running में भी अपना नाम उज्जवल किया है ,

चेन्नई में हुए ओपन नेशनल गेम्स पैरा में 100 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता |

उसके बाद विश्व के चार अन्य महाद्वीप पर सफल झंडा रोहण किया इसमें अफ्रीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका , की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराया हैं।

उनकी एक पुस्तक है born again in mountain जिसका विमोचन माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने किया है।

भारत सरकार ने अरुणिमा को पदमश्री सम्मान भी दिया है।

आज कल आप उन्नाव के बेथर गांव में शहीद चंद्रशेखर आजाद खेल अकादमी और प्रोस्थेटिक लिंब रिसर्च सेंटर के रूप में अपने सपने को आकार देने में भी जुटी हैं.

अरुणिमा कहती हैं, ''मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं। पर हमें अपने लक्ष्य से भटकता नही चाहिए बल्कि उनका सम्मान और सामना करना चाहिए।

अरुणिमा का जीबन संघर्ष करने वालो को सदा प्रेरणा देता रहेगा .....
आप की सदा जय हो ...आप को सदा विजय मिले ...मंगल हो

Friday, October 14, 2016

लालच बुरी बला है...

लालच बुरी बला है..

यह एक पुरानी कहावत है । बचपन मे मैने एक कहानी बन्दर और मगरमच्छ की पढ़ी थी। आज आपके लिए यही कहानी लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।

बहुत समय पहले की बात है की एक जंगल मे नदी के किनारे एक पेड़ था पेड़ पर एक बन्दर रहता था और पानी मे भी एक मगरमच्छ रहता था |

बन्दर जंगल के इस पेड़ के मीठे फल को खाता रहता था और हमेसा मस्त रहता था और साथ वो फल को मगर को भी खिलाता था । इससे दोनों मे अच्छी दोस्ती हो गयी थी।

दोनों अक्सर अपने सुख दुख share करते रहते थे। और अपना अकेलापन भी  काटते थे। लेकिन मगर धूर्त  और काइयाँ भी था। यह बात बन्दर को नहीं पता था वो मगर को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता था।

एक दिन मगरमच्छ के दिमाग मे एक bad आईडिया आया । उसने सोचा की यह बन्दर इतना मीठा फल खाता है , तो इसका कलेजा कितना मीठा होगा इस पर उसने बन्दर के कलेजे को खाने का प्लान बनाया ।

एक दिन जब बन्दर नदी के किनारे आया तो मगरमच्छ ने अपने plan के अनुसार बन्दर को लालच का एक offer दिया - "बन्दर भाई नदी के उस पार बहुत ही सुन्दर और मीठे फल के पेड़ है लेकिन मैं पेड़ पर नहीं चढ़ सकता हूँ अगर तुम चाहो तो उन फलो का आनंद उठा सकते है।"

बंदर ने पूछा मगर भाई -आप को कैसे पता कि वो फल मीठे है ? मगरमच्छ ने जबाब दिया की मैंने वहाँ के बंदरो को बहुत मजे लेकर फल खाते देखा है और मैंने भी उन फलों को खाया है । और वहाँ के बन्दर मेरे दोस्त भी है लेकिन तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो , तो मैंने सोचा की तुम को भी उनका आनंद उठा लेने का मौका दूँ।

बन्दर के मन भी उन फलों के खाने का लालच आ गया । और उसने मगर की बात पर विश्वास कर लिया। और वो कुछ भी करने को मानसिक रूप से तैयार हो गया । उसने मगरमच्छ से बोला की भाई मे उस पार जाकर उन फलों का स्वाद कैसे ले सकूंगा। इस पर मगर ने बोला – भाई तुम्हारा ये मगर दोस्त किस दिन के लिए है मैं तुम्हे वहाँ ले कर चलता हूँ। आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ।

बन्दर बहुत ही खुश हुआ | वह जाकर मगरमच्छ की पीठ पर बैठ गया । लेकिन नदी की बीच धारा मे पंहुच कर मगर रुक गया और बन्दर से बोला -"तुम इतने मीठे फल खाते हो तो तुम्हारा कलेजा भी खूब मीठा होगा | मैं तुम्हे मार कर तुम्हारा कलेजा खाऊंगा।

यह सुनकर बन्दर बहुत डर गया और बोला भाई मुझको माफ़ कर दो और मुझको छोड़ दो , लेकिन मगरमच्छ नहीं माना और अपनी बात पर अड़ा रहा।

इसके बाद बन्दर ने अपना दिमाग लगाया और मगर से बोला - भाई तुम्हे पहले बोलना था न कि आपको मेरा कलेजा का स्वाद चाहिए मैं आपको दे देता । मै अपना कलेजा पेड़ पर ही भूल आया हूँ । कल ही उसकी साफ सफाई की थी और सूखने के लिए पेड़ पर टांग रखा था जल्दी मे मैं उसको लाना ही भूल गया ।

बेवकूफ मगर ने बन्दर की बात पर विश्वास कर लिया। और वापस पेड़ की ओर चलने लगा ।

किनारे पर पहुचते ही बन्दर उछल कर पेड़ पर चढ़ गया और बोला बेवकूफ मगर आज से तुम्हारी हमारी दोस्ती खत्म । मैं विश्वासघातियों से दोस्ती नहीं रखता ।

निष्कर्ष -
1- बन्दर ने मन ही मन निष्कर्ष निकाला कि लालच बुरी बला है । कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। दरअसल किसी भी चीज को पाने की इच्छा में सही और गलत , अच्छे और बुरे का ध्यान न रखना ही लालच का भाव हैं । जिस वस्तु पर हमारा कोई अधिकार न हो उसे पाने की चाह भी हमें लालच के रास्ते की ऒर ले जाती हैं और इस रास्ते से सदैव दूर रहे क्यूंकि यह विनाश का रास्ता हैं ।  क्यों की बन्दर अगर दिमाग नहीं लगता तो उसकी जान जा सकती थी।लेकिन आज लालच के चक्कर मे रोज अनेको लोग अपनी जान गवाँते है.

2 -लालच का भाव ही मनुष्य को अहित के मार्ग पर ले जाता हैं | चूकि लालच की इच्छा में हमें सही गलत का ज्ञान नहीं रहता बस उसे पाने लालसा होती हैं । ऐसे में वो एक गहरी खाई मे गिरने की तरह है जब पता चलता है कि मै गलत हूँ तो तब वो वापस भी नहीं लौटना कठिन होता है।


3- दूसरे की बात पर सोच समझ कर फैसला लेना चाहिए और अपने मे ही संतुष्ट रहना चाहिए । आज इसी लालच के कारण हजारो लोगकानून तोड़ने और जेल मे  कैद की सजा के शिकार हो रहे है । और तो और human trafficking का शिकार होना भी इसी लालच का एक परिणाम है ।

4- हमें किसी के साथ दोस्ती भी सोच समझ कर करना चाहिए । जिससे भी दोस्ती करे उसके बारे मे भुत (past) की कुछ बातों मतलब उसके चाल चलन के बारे मे पता लगा ले।

5- जब कोई एक बार जब कोई लालच में पड़ जाता है तो उसका यह लालच आसानी से खत्म नहीं होता। और उसको पता ही नहीं चलता कि उसे कब रुकना है।  अतः लालच की एक CHAIN से बन जाती है.

6-अगर कोई भी लालची होगा तो उसके साथ भी कभी अच्छा नहीं होगा । मगरमच्छ ने भी लालच के कारण अपना एक सच्चा दोस्त खो दिया ।और आज भी इस दोस्ती के कारण आंसू बहा रहा है। यानि नुकसान cheating करने वाले cheater का भी होता है।

6- आस्तीन के साँप से दोस्ती नहीं करनी चाहिए। ऐसे छुपे चेहरे वाले लोग ही आज समाज मे अपराध को अंजाम दे रहे है अतः सतर्क (conscious ) रहे स-तर्क (logical) भी।

Wednesday, October 12, 2016

cold मौसम में स्वस्थ कैसे रहें

COLD मौसम में कैसे स्वस्थ रहें  /    ठण्ड से कैसे बचे रहें !!

सर्दियों में शरीर सुस्‍त हो जाता है इस कारण अधिकतर लोग ठंडक के मौसम को जरा कम ही पसंद करते है।

हालांकि ठण्ड का अपना ही मजा है लेकिन ज्यादे ठंडी से मनुष्य बीमार भी हो सकता है ख़ास तौर पर बच्चे

और बुजुर्ग ।अतः जरुरी है की कुछ कारगर उपाय किये जाए जिससे ठंड  मे  भी स्वस्थ रहा जाए।




ठंड से बचने के लिए हमें दो स्तरों पर कार्य करने की जरूरत होती है

1-शरीर को सर्दी से बचाने के लिए और शरीर की ऊर्जा का क्षय न हो इसके लिये हम गर्म कपड़ों का प्रयोग करते है साथ ही जिस घर मे हम रहते है वहां का भी तापमान का संतुलन बनाये रखा जाना चाहिए।

2 -शरीर के द्वारा खर्च किये गए ऊर्जा की मात्रा को बनाए रखने के लिए और और शरीर को गर्म बनाये रखने के लिए भोजन और पानी के स्तर पर भी सावधानी की ज़रूरत है।हमें ऐसा भोजन करना चाहिये जो हमें ठण्ड के समय में गर्म रखे।


ठण्ड आने का आगाज तब होता है जब सुबह और शाम को तापमान में गिरावट को महसूस किया जा सकता है।
दिन छोटे होने लगते है और रातें लंबी होने लगती है । सामान्तया मौसम का ये बदलाव नवरात्र के समाप्ति के साथ देखा जा सकता है ।

सामान्यतया निम्नांकित उपाय किये जा सकते है --
ठण्ड के कपड़ो को तैयार करें

पूरी तरह से ठंड आये इससे पहले जरुरी है कपड़ो को निकाला का एक दो दिन धुप दिखा दिया जाए इससे छुपे हुए बैक्टरिया मर जाते है और ऊनी कपड़ो के रेशो मे गर्मी प्रवेश कर जाती है जिससे सुकुड़े रेशे खिल जाते और हमें गर्म रखते है । बीच बीच पूरी ठंढी भर जब भी खिली धुप मिले ऐसा करते रहना चाहिए। खिली निखरी धुप न केवल ऊर्जा को बचाये रखती है साथ ही हमारे शरीर के सेरोटोनिन और उत्पादित कर हैप्पी मूड बनाये रखती है।


हरी और ताज़ी सब्जियां खाएं-

कभी सोचा है कि ठंड मे सब्जियों की ज्यादे विविधता क्यों होती है । प्रकृति की देंन है सब्जियां । पालक, खीरा, पत्ता गोभी, फूलगोभी, मटर और और कई प्रकार की शाक जैसी हरी पत्तेदार सब्जियों मिलने लगती है । अपने भोजन में अधिक से अधिक शामिल करके ऊर्जा की मात्रा को बढ़ा सकते है । हरी सब्जियां सेलुलोज से भरपूर होती है जो शरीर के विषैले तत्‍वों को बाहर निकालने में मदद करती है और ये हमारे ऊर्जा के स्तर को बढाती भी है।

विविध फलों का सेवन करे-

इस मौसम मे फलों मे भी विविधता होती है सीजनल फल का सेवन करे । विशेष कर खट्टे फलों का सेवन अधिक करें।  संतरा हो चाहे नींबू, विटामिन c से भरपूर होते है जो कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते है बढता है। साथ ही यह शरीर को गर्म रखने में मदद करते है।

विटामिन, फाइबर से भरपूर ये फल पचने मे आसान होते है । इनमें पानी की मात्रा अधिक होती है, जिस से शरीर के विषैले पदार्थ बाहर निकल जाते है। इससे ब्लड शुगर के स्‍तर को नियंत्रित रहता है और शरीर की उर्जा हमेशा बनी रहेगी। इसलिए इस मौसम मे मिलने वाले फलों कक अपने आहार में जैसे संतरा, केला सेब, अनार, अंगूर आदि को शामिल करें।

समय पर खायें-

समय पर भोजन न करने से शरीर में ब्‍लड शुगर का स्‍तर कम हो सकता है। जिससे शरीर में ऊर्जा का स्‍तर कम होने लगता है। इसलिए शरीर की ऊर्जा को बरकरार रखने के लिए समय पर भोजन करें। काम के चक्‍कर में भोजन की अवहेलना न करें। समय पर पौष्टिक भोजन करते रहें।

नाश्ता जरूर करे भरपूर करें -

पूरा दिन ऊर्जावान रहने के लिए सुबह का नाश्‍ता सबसे ज्‍यादा जरूरी होता है।लंबी रात मे खाने केे बाद सोने के दौरान काफी मात्रा में ऊर्जा नष्ट होती है और रात ज्यादे ठण्ड होती है इसलिए सुबह शरीर को जल्दी से एनर्जी की जरूरत होती है। इसलिए सुबह के समय स्‍वस्‍थ और पौष्टिकता से भरपूर नाश्ता करना चाहिए। नाश्ते में कार्बोहाड्रेट युक्त चीजें लें, जैसे अंकुरित अनाज, और तली हुई चीजे जैसे पूरी और पराठा का सेवन करे ।

पानी का अधिक सेवन करना चाहिए -

सर्दियों में डीहाइड्रेशन की समस्या भी हो सकती है इसलिए पानी भरपूर पीते रहें। ऐसा इसलिए भी जरुरी है कि ठण्ड के कारण मूत्र ज्यादे बनता हैंऔर सांसो से भी वाष्प के रूप मे पानी बाहर निकल जाता है इसलिए अक्सर पानी की कमी डीहाइड्रेशन कर देती है जिससे थकान और कमजोरी महसूस होती है। ऐसे में पानी थकान को दूर करने और एनर्जी को बढ़ाने का सबसे आसान तरीका है।

भोजन पर ध्यान दे-

ऐसे मौसम मे हमें वो चीजें खानी चाहिए जो शरीर को गर्म रखे अतः इस मौसम में प्रोटीन व फाइबर से भरपूर चीजें खानी चाहिए। विटामिन बी-12 युक्त खाद्य जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां, फलियां, हरे चने चना और बथुआ का साग आदि का सेवन किया जाए। अंडे और मछली का सेवन भी किया जा सकता है। पोल्ट्री उत्पाद, हरी पत्तेदार सब्जियां आदि में जिंक होता है। जिंक हमारे भोजन का अभिन्न अंग है इसकी कमी से जुकाम, थकावट, भूख न लगना, घावों का धीमी गति से भरना आदि समस्याएं उत्पन्न होती है जिससे बॉडी का इम्मयून सिस्टम कमजोर हो सकता है। खजूर शहद और शुद्ध देशी घी, गुड़ आदि के सेवन से ऊर्जा ज्यादे मात्रा मे प्राप्त होती है।

बथुआ और हरी मेथी के साग का सेवन करे-

मेथी का सेवन किसी भी रूप में सेवन करने से सर्दी का बचाव होता है बथुआ और मेथी के साग में विटामिन के, आयरन, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक, कॉपर और फोलिक एसिड में अधिक होता है जो बॉडी मे ब्लड के उत्पादन के लिए जरुरी होता है और शरीर गर्म रहता है।

लहसुन का सेवन करे -

लहसुन में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं; इसलिए यह बैक्टीरिया और वायरस से फैलने वाले रोगों से बचने में मदद करता है साथ ही यह ठड के कारण बढे उच्च कोलेस्ट्राल लेवल को कम करता है। गले की खराश को कम करता है।लेकिन, लहसुन का एक अन्य महत्वपूर्ण फायदा है कि यह सर्दियों में आपके शरीर को गर्म रखता है।

अजवाइन और जायफर  का सेवन करे-

अजवाइन बंद नाक आदि सर्दी के लक्षणों का इलाज करने के लिए सबसे अच्छा प्राकृतिक तरीका है। राहत के लिए गर्म पानी में अजवाइन डालकर भाप ले,नाक तुरंत खुल जाएगी और सर्दी में भी आराम होगा और दो तीन दिन पर एक चम्मच सेवन भी गुड़ मे मिला कर करें।२-३ दिनों पर चुटकी भर जायफर को मुह मे ले  कर चूसते रहे ठण्ड नहीं लगेगी

खाने मे हरी मिर्च और लाल मिर्च का सेवन करे -

हरी मिर्च मे विटामिन इ और सी के साथ फाइबर और एंटीऑक्‍सीडेंट और आयरन से भरपूर होने का गुण रखती है इसका तीखापन बॉडी को गर्म रखता है और इम्मयून सिस्टम बनाये रखता है।

शरीरिक श्रम करे -

योगासन , जॉगिंग या पी टी या walking के रूप मे किया जाने वाला प्रत्येक श्रम बॉडी मे ऊर्जा का संतुलित स्तर को बनाये रखता है नकारात्मक विचार को दूर करता है शरीर के अंगों को बल प्रदान करता है। और मानसिक स्तर पर बल प्रदान करता है।

चाय काफी ज्यादे न पिए -

कैफीनयुक्त पदार्थो जैसे चाय और कॉफी का सेवन ज्यादे मात्रा मे न करे इसकी ज्यादा मात्रा शरीर पर नकारात्मक प्रभाव डालती है । इसकी जगह आप गुड़ की चाय और ग्रीन टी का सेवन कर सकते हैं।अदरख, तुलसी पत्ती और काली मिर्च, अजवाइन और निम्बू की चाय का सेवन कर सकते है यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढा कर शरीर से दूषित तत्व को निकाल कर भूख बढाती है।

Sunday, October 9, 2016

3 छोटी शिक्षाप्रद कहानियां

3  छोटी शिक्षाप्रद कहानियां


कहानी संख्या -1 "रफू वाली सुई"

एक रफू करने वाली सुई को अपने ऊपर बहुत घमंड था वह अपने आप को किसी से कम नहीं समझती थी।

मगर दुर्भाग्य से एक दिन किसी मजबूत कपड़े को रफूू करते वक़्त उसकी आंख फूट गई। इस पर दर्जी महिला ने उस सुई को फेंकने के बजाए उसे अपने जैकेट मे पिन की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

सुई को घमंड मे लगा कि वह सर्वश्रेष्ठ हो गई है । एक दिन सुई जैकेट से निकलकर रसोई के सिंक में जा गिरी और नाली में उसे भ्रम होने लगा कि उसका जन्म नई दुनिया को खोजने के लिए हुआ है।

नालियों में बहते बहते घिस घिस कर सुई बहुत चमकीली हो गई । जल्द ही  उसकी दोस्ती अन्य वस्तुओं से भी हो गई इसमें उसका एक दोस्त बोतल का ढक्कन भी था। दोनों  अक्सऱ बात करते करते फेकते रहते थे ।

एक दिन ढक्कन ने सुई से कहा कि निश्चित रुप से आप एक तलवार है। यह सुन कर सुनकर बोली "तुम बिल्कुल ठीक कर कह रहे हो मैं राजा की तलवार ही हूँ। दुसरी ओर सुई भी ढक्कन को हीरा कह कर बुलाती थी।

इस तरह सुई और बोतल का ढक्कन एक दूसरे से अपने बारे में झूठे किस्से सुनाते रहते और धीरे-धीरे नालियों में झूठ बोलकर अन्य बहने वाली वस्तुओं का भी दिल बहलाते रहते थे

चूकि दोनों की दोस्ती की बुनियाद घमंड और झूठ पर टिकी थी इसलिए वह दोनों अभी तक वहीं पड़े हैं और दोनों भरम मे डूबे हुए है ।

निष्कर्ष - इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि घमंडी और झूठ बोलने वालों का यही हश्र होता है । घमंडी और झूठे लोग सुई और ढक्कन की तरह गंदे नाले में पड़े रहते हैं।
----------


कहानी संख्या 2- 100 सिर वाला ड्रैगन

एक बार एक राजकुमार एक बार भयानक जंगल से गुजर रहा था तभी उसने सामने से एक ड्रैगन को आते हुए देखा।  यह ड्रैगन 100 सर वाला था । और देखने मे बहुत ही भयानक भी था।

इसके पहले भी राजकुमार कई dragon से लड़ा था और उन्हें हराया था। उनमे कुछ तो बहुत ही  बड़े थे । लेकिन इस राजकुमार के लिए इससे भी लड़ना आसान लगा ।

उसने मन ही मन सोचा इस से जीतना मुश्किल नहीं होगा है अतः उसने इससे लड़ाई की और उसे मार डाला।

राजकुमार सही था क्यों कि सौ सर होने के कारण उसके धड़ का विकास अच्छी तरह नहीं हुआ तथा उससे बड़ी आसानी से हराया जा सकता था ।

कुछ समय बाद राजकुमार को एक और ड्रैगन मिला है जिसका केवल एक सर था लेकिन उसके सौ पैर थे। राजकुमार उस से लड़ने के लिए आगे बढ़ा मगर इस बार इस ड्रैगन ने  राजकुमार को अपने पैरों में फंसा कर मार डाला।

निष्कर्ष - इस कहानी से हमें पता चलता है कि बेहतर है कि हमारे पास सौ पैर हो जो हमारे एक सर का कहना माने और हमारे कहे के अनुसार चले, इसके बजाय कि हमारे पास सौ सिर हो जो हमें आदेश दें।
---------





कहानी संख्या -3- "जादुई गदा"

एक मेहनती युवक एक  जादूगर के पास नौकर का काम करता था। जब वह वहां से अपने घर वापस जाने लगा तो जादूगर ने उसे उपहार स्वरूप एक गदा ईनाम मे दी    और कहा कि "मारो मारो" कहने पर यह गदा तब तक लोंगो को मारती रहती है जब तक इसे रुक जाओ का आदेश नहीं दिया जाता है ।

उस गदा ने सारे जंगली रास्ते पर उस व्यक्ति की दुष्टो से रक्षा की। एक रात में वह एक सराय में रुका है लेकिन रात मे वहां पर डाकूओ ने आक्रमण कर दिया।   मगर गदा की वजह से उन सब डाकुओं को भागना पड़ा।

युवक के प्रति कृतज्ञ होने के स्थान पर सराय के मालिक का गदा को चोरी करने के बारे में सोचा । ये सारी बातें युवक को पता चल गई और उसने चालाकी से काम लिया वह लेटे लेट सोने का नाटक करने लगा।

जैसे सराय का मालिक गदा चोरी करने आया तो उसने कहा "मारो मारो " और गदा ने सराय के मालिक की जमकर पिटाई की।

अपने देश पहुचने पर उसने देखा कि उसके देश की राजधानी को दुश्मनों ने घेर रखा है और वेा जीतने वाले है।

यह देखकर युवक मैदान मे गया और उसने कहा -मारो मारो ।

गदा ने तुरंत दुश्मन देश के सिपाहियों को मार लगाना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर मे दुश्मन के सारे सिपाही भाग गए ।

राजा को जब यह सब ज्ञात हुआ तो उसने राजकुमारी का हाथ युवक के हाथ मे दे दिया ।

निष्कर्ष- इस कहानी से हमें लगता है कि हम जब भी हम किसी ताकत या शक्ति का प्रयोग लोक या समाज या

सार्वजनिक हित के लिए करेंगे तो वो शक्ति हमारा साथ देगी और उसके साथ हमारा नाम भी रोशन होगा।

Monday, October 3, 2016

  "नारी   की    प्रशंसा    मे   12  महान    व्यक्तियों   के   शब्द "


              "नारी   की    प्रशंसा    मे   12  महान    व्यक्तियों    के   शब्द "



नवरात्र के इस 9 दिनों मे माँ दुर्गा की स्तुति की जाती है।  "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता" और "एक नहीं

दो दो मात्राएं नर से भारी नारी है"  जैसे शब्दों को  प्रयोग कर नारी को समाज मे  उच्च स्थान दिया है।  आइये

नारी के सम्बन्ध मे  इस सदी मे कहे गए कुछ महान  व्यक्तियों के द्वारा कहे गए 12  वाक्य का स्मरण करे  और

नमन करे इस देवी का.



1-  जब एक पुरुष एक शिक्षित होता है तो एक व्यक्ति शिक्षित होता है नारी जब शिक्षित होती है तब पूरा
    
      परिवार  शिक्षित होता है - महात्मा गांधी

२-  जब महिलाएं आगे बढ़ती है तो परिवार आगे बढ़ता है जब परिवार आगे बढ़ता है तो राष्ट्र अग्रसर होते हैं -
      
       जवाहर लाल नेहरू

३-  आधा आसमान स्त्री के सर पर है  -   माओ

4 -  औरतों की स्थिति सुधारे बिना दुनिया का कल्याण संभव नहीं है क्योंकि एक पंख से एक चिड़िया उड़ नहीं

       सकती है -  स्वामी विवेकानंद

5 -   तुम मुझे एक माता दे दो मैं तुम्हें योग्य राष्ट्र दूँगा -  नेपोलियन बोनापार्ट

6 -   अपना घर और अच्छी नारी स्वर्ण और मुक्ता के समान  है - गेटे

7 -   नारी की उन्नति और अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति उन्नति एवं अवनति निर्भर है-  अरस्तू

8 -  स्त्री परिवार की शोभा तथा घर की लक्ष्मी है  -   मनु

9 -  स्त्रियों की मान-हानि  लक्ष्मी और सरस्वती की मान हानि है | - सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला"

10 -  आप एक आदमी को शिक्षित करते है तो  आप एक आदमी को शिक्षित होता है  जब आप एक

        औरत को शिक्षित करते है तो आप एक पीढ़ी को शिक्षित करते हैं  -  ब्रिघेम यंग

11 -  अच्छी औरतों का प्रभाव सभ्यता को मापने के लिए एक पर्याप्त मानदंड  है - राल्फ वाल्डो एमर्सन

12 -  महिलाएं पुरुषों से अधिक बुद्धिमान होती है  क्योंकि वो  समझती ज्यादा है और जानती कम -   जेम्स-थर्बर

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

Sunday, October 2, 2016

पुरुषार्थ - अपने ही कदमो पर आगे बढ़ना है....

बचपन की पढ़ी हुई कहानियो का सार बड़े होने पर समझ  मे  आता है ऐसी कई कहानियों ने  मुझे बचपन मे बहुत   प्रभावित किया था  ऐसी ही एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ..

बहुत समय पहले की बात है एक चिड़िया ने मक्के के खेत में अंडे दिए थे. हालांकि उन अंडों से बच्चे निकल आये थे लेकिन अभी छोटे थे और पूरी तरह उड़ना नहीं जानते थे ।

चूंकि फसल पक गयी थी अतः चिड़िया को यह चिंता थी कि कही फसल की कटाई उसके बच्चों के उड़ने लायक होने से पहले ही न हो जाए। इसलिए वह जब भी भोजन ढूंढने जाती तो आपके बच्चों को सतर्क रहने के लिए कहती थी।

एक शाम जब चिड़िया लौटी तो उसने बच्चों को डरा पाया। सबसे छोटे बच्चे ने कहा- माँ, आज खेत के मालिक ने अपने लड़के को फसल काटने के लिए अपने बच्चो से कुछ मजदूर ढूंढ कर ले आने के लिए कहा। यह सुनकर चिड़िया मुस्कुरायी और बोली- चिंता मत करो मेरे बच्चों, कल फसल काटने कोई नहीं आएगा।

और चिड़िया सही थी क्यों कि  अगली सुबह फसल काटने कोई भी नहीं आया । जब किसान ने अपने बेटे को फसल काटने के लिए कहा तो बच्चों ने कहा पिताजी !! मजदूर नहीं मिल रहे हैं जब मिल जायेंगे तो फसल कटवा लेंगे।

चिड़िया के बच्चों ने शाम को वापस लौटने पर फिर किसान और उनके पुत्रों की पूरी बातचीत बताई लेकिन समझदार चिड़िया फिर भी परेशान ना हुई।

इस प्रकार कुछ दिन और बीत गए एक दिन चिड़िया ने किसान को अपने बच्चो से कहते सुना -अब बहुत हो गया कल मैं खुद ही फसल की कटाई करूँगा अब मैं दूसरों पर भरोसा नहीं कर सकता  हूँ। 

यह सुनकर चिड़िया अपने बच्चों से कहा बच्चो अब यह घर छोड़ने का समय आ गया है और उसके साथ ही  चिड़िया अपने बच्चो तुरंत वहां से ची ची करती उड़ चली क्योंकि अब उसे पूरा विश्वास था कि अगली सुबह फसल कट ही जाएगी और दूसरे दिन चिड़िया ने आकर देखा तो फसल कट गई थी।


इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब तक  हम अपना कार्य स्वयं नहीं करेंगे तब तक दूसरा भी हमारे कार्य की तरफ कोई ध्यान नहीं देगा।  इसलिए हमें अपना कार्य खुद ही करना चाहिए। तभी तो कहा जाता है अपने कदमो पर आगे बढ़ना ही पुरुषार्थ है।

Saturday, October 1, 2016

एकाग्रता ही जीवन का सार है....

एकाग्रता ही जीवन का सार है

एकाग्र करने की योग्यता यानी एक के प्रति अग्र करने की योग्यता है। जिसने इसको सीख लिया वो जीवन का हर युद्ध लड़ सकता है ।

बहुत समय पहले की बात है चीन मे एक यौद्धा था जो की तलवारबाजी में बहुत निपुड़ था। एक रोज उसने अपने नौकर को अपनी पत्नी के साथ आपत्तिजनक अवस्था मे देख लिया। अपने काबिले की परंपरा के अनुसार यौद्धा ने अपने नौकर को युद्ध की चुनौती दी, कि दोनों मे कोई एक ही जीवित रहेगा।

नौकर को तो तलवारबाजी का क ख ग भी नहीं आता था। पहले तो उसने मालिक को इसके लिए मना किया लेकिन मालिक के जोर देने और कहा कि वह तलवार चलाना नहीं जानता इसलिए उसे कुछ समय दीजिए, ताकि वो किसी के पास जाकर कुछ सीख सके । इस पर योद्धा ने उसे समय लेने पर सहमति जताई । तब नौकर एक अन्य गुरु यौद्धा के पास गया ।
दूसरे योद्धा ने नौकर से कहा, ‘ तुम्हारा स्वामी इस कबीले का सर्वश्रेष्ठ तलवारबाज है बचपन से उसने तलवारबाजी सीखी है .अतः तुम बाकि बचे जीवन मे भी अभ्यास करोगो तो भी तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता है तुम हार जाओगे।

उसने नौकर को सलाह दी कि उसके लिए लड़ाई का यही सही समय है इसमे अंतिम रूप से एक चीज तय है कि तुम्हारी मृत्यु हो जाये । जो कि जीवन का अंतिम सत्य है लेकिन इसके अलावा तुम्हारे पास खोने के लिए और कुछ नहीं है।

लेकिन तुम्हारे master की कई चीजें दांव पर हैं जैसे धन जमीन , पद पत्नी, और सम्मान आदि। चुकि उसका ध्यान इस सब चीजों पर होगा इसलिए वो अपूर्ण ऊर्जा के साथ लड़ रहा होगा लेकिन तुम अपना ध्यान सिर्फ तलवारबाजी पर होगा और तुम्हे अपना पूरा ध्यान लगाना ही पड़ेगा क्यों की जिस पल के लिए तुम्हारा ध्यान भटकेगा, वही तुम्हारे लिए आखिरी पल होगा। अतः बिना किसी कायदे कानून नियम के बारे मे समय गवांये तलवार उठाओ और टूट पड़ो, युद्ध करना शुरु कर दो।


दूसरे दिन ही उसने मालिक को युद्ध की चुनौती दी कि वह युद्ध के लिए तैयार है। योद्धा को विश्वास नहीं हुआ वो मानसिक रुओ से तैयार नहीं था लेकिन मैदान मे आकर युद्ध के किये तैयार हो गया ।

नियमों के अनुसार अभिवादन कर नौकर ने तलवार चलानी शुरू कर दी। मालिक भौच्चका था क्यों की नौकर जहां तलवार का वार कर रहा था वहां कोई एक्सपर्ट सोच नहीं सकता था। जल्द ही योद्धा ने एक कदम पीछे हटा लिए । इस पर नौकर का साहस थोड़ा बढ़ा। उसने बस तलवार चलाने रहने का कार्य किया बिना यह जाने कि क्यों और कैसी लड़ाई लड़ रहा है।

चूकि नौकर अपने मौत के डर से बाहर आ चुका था और उसको पता था कि उसके पास खोने को कुछ नहीं है पाने को बहुत कुछ इसलिए जल्द ही उसने master को हार के करीब ला कर खड़ा कर दिया।

मृत्यु का डर सामने देख कर मास्टर ने अपना सब कुछ देकर संन्यास ग्रहण करने की घोषणा की वह सन्यास के दिनों मे भी यह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर नौकर में यह साहस कहां से आया?

इस कहानी से ये शिक्षा मिलेगी है यह मन की एकाग्रता ही सबसे महत्वपूर्ण तत्व है । वर्तमान मे जीना ही मनुष्य को जागरुक बना देता है और परिस्तिथियों के प्रति क्रिया प्रतिक्रिया सीखा देता है ।