दीपावली : पाँच पर्वो का पुंज
त्योहार या उत्सव हमारे सुख आनंद और हर्षोल्लास के प्रतीक है जो परिस्थिति के अनुसार अपने रंग-रुप और आकार में भिन्न होते हैं। त्योहार मनाने के तरीके भिन्न भिन्न हो सकते है किंतु इनका मूल अभिप्राय आनंद और ऊर्जा प्राप्ति ही होता है।
लगभग सभी त्योहारों का कोई न कोई पौराणिक महत्व है जिनका अधिकतर भाग आस्था से जुड़ा होता है। यह संभव हो पौराणिक कथाएं प्रतीकात्मक महत्व की हो क्यों कि इनका मकसद सामाजिक व्यवस्था का नियमन एवं संचालन होता है।
कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इसे दीवाली भी कहते है।
वास्तव मे दीवाली सिर्फ एक दिन का त्योहार न होकर, त्योहारों की एक श्रृंखला है। जिसके साथ पांच पर्वों जुड़े हैं। जो कि दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।
सभी पर्वों की अलग अलग धार्मिक, पौराणिक महत्त्व है ।जिसके पीछे अलग अलग दंत-कथाएं भी है ।
भारत में दीपावाली त्यौहार का महत्व
1- हिन्दू मान्यता के अनुसार दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास को खत्म कर घर लौटे थे। अपने प्रिय राजा के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए थे। तब से लेकर आज तक यह प्रकाश-पर्व के रूप मे भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है।
2- भारतीय परंपरा मे ये मान्यता है कि सत्य की सदा जीत होती है। दीपावली का वास्तविक भाव भी यही है ।
असतो मा सद्गगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय। इस प्रकार दीपावली व्यक्ति को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व है। आज भी प्रत्येक दीपावली के दिन एक दीपक से ही दूसरा दीपक जलाया जाता है और इन दीपों से निकलने वाला यह प्रकाश सदियों से व्यक्ति और उसके समाज को शांति व भाइचारे का संदेश देता आ रही है। दिवाली अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन लोग आपसी दुश्मनी दूर करने और प्यार और दोस्ती को बढाने के लिये इस दिन मिठाई और उपहार वितरित करते है।
3- कृष्णपंथ के मतानुयायी मानते है कि इस दिन द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण ने चतुर्दशी (दिवाली से एक दिन पहले) को बुराई के प्रतीक राक्षस नरकासुर के ऊपर विजय की थी जिसके उपलक्ष्य में दिवाली को मनाया जाता है।
4- यह पांडवो के 12 वर्ष के निष्कासन के साथ साथ 1 वर्ष के अज्ञातवास अर्थात् छुप कर रहना से वापस घर आने के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है।
5- एक पौराणिक मान्यता के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था
6- जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने 527 ई0पू0 मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति किया था जिसके उपलक्ष्य में यह पर्व मनाया जाता है, और आर्य समाजवादियों द्वारा महावीर स्वामी की मृत्यु की वर्षगांठ या शरदीया नव-शयष्टी के रुप में मनाया जाता है।
7- सिक्ख धर्म मे भी अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और इस दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द जी को जेल से रिहा किया गया था।
8- हिन्दू कलैण्डर के अनुसार दिवाली (अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष का अन्तिम दिन) पर मारवाङी अपना नया साल मनाते है।
9- गुजराती भी चन्द्र कलैण्डर (कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष के पहले दिन) के अनुसार दिवाली से एक दिन बाद अपना नया साल मनाते है।
10- आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दीपावली बंधनसे मुक्ति का दिन है। व्यक्ति के अंदर अज्ञानरूप अंधकार का साम्राज्य है। दीपक को आत्म ज्योति का प्रतीक भी माना जाता है। अतः दीप जलाने का तात्पर्य है- अपने अंतर को ज्ञान के प्रकाश से भर लेना, जिससे हृदय और मन जगमगा उठे। इस दिन चतुर्दिक तमस् में ज्योति की आभा फैलती एवं बिखरती है। अंधकार से सतत् प्रकाश की ओर बढ़ते रहना ही इस महापर्व की प्रेरणा है। इसलिए सभी स्थानों पर सरसो के तेल के दीयें जलाने से बुरी ऊर्जा जल कर नष्ट होगी और अच्छी ऊर्जा आकर्षित होगी। इस प्रकार आध्यात्मिकता की दृष्टि से यह जागरूकता और भीतर के प्रकाश के जश्न का त्यौहार है।
शुद्ध आत्मा, समृद्धि और भगवान के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिये अपने अंदर और बाहर जैसे घरों, कार्यालयों और अन्य काम के स्थानों की साफ सफाई और रंगरोगन का त्यौहार है। साल भर की गन्दगी की घर से बाहर निकलने से नकारात्मक ऊर्जा की समाप्ति के साथ सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
बुराई को दूर करने के लिए लोग बहुत तेज ध्वनि करते है और हर जगह रोशनी का प्रयोग करने है इसका अपना एक विशेष महत्व है।
लोग पूरे वर्ष के लिए अच्छा स्वास्थ्य, धन, ज्ञान, शांति, समृद्धि प्राप्त करने के मिथक में पटाखों का प्रयोग करते है। इनका प्रयोग से उच्च श्रेणी विभिन्न फ्रीकेन्सी की ध्वनि निकलती है जो कि लोगों की असली खुशी का संकेत है। दूसरी ओर पटाखों से निकला धूआ बरसात के मौसम के बाद उत्पन्न हुये बहुत से कीडों को मारता है। लेकिन आज यह तेज आवाज और खतरनाक पटाखों का उत्सव बनता जा रहा है लेकिन दिवाली पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का पर्व नहीं है।
लेकिन दीवाली त्योहार का मतलब सिर्फ पटाखा फोड़ना नहीं होता है। जरा सोचिए पटाखों के कारण कितने दमें के मरीज खाँसते-खाँसते बीमार हो जाते है । कितने ही घरों में आग लग जाती है और कितने लोग पटाखों के कारण घायल और मृत हो जाते है।
वास्तव मे दिवाली पर्व है प्रकाश का । यह पर्व समाज से अंधकार को समाप्त कर उल्लास, भाईचारे व प्रेम का संदेश फैलाने की प्रेरणा देता है न कि खतरनाक पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का। यह पर्व है साफसफाई और घरों को सजाने का । लोग अपने घर और ह्रदय को आशीर्वाद, बुद्धि और धन का स्वागत करने के लिये गन्दगी बाहर निकलते है। सजाते है. रंगोली बनाते है, दरवाजे पर पर्दे लगाते है, इस दिन देवी लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा करते है।
11- दीवाली का पर्व लक्ष्मी जयंती का पर्व भी है। कमला जयंती, लक्ष्मी जयंती के लिये भी प्रसिद्ध है। लक्ष्मी का संबंध सुख, संपत्ति, समृद्धि, वैभव आदि से है।
दीपावली का सीधा संबंध लक्ष्मी पूजा के रूप में है। समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकले थे, जिनमें पहले रत्न लक्ष्मी अर्थात् ‘श्री’ के प्रकट होने की कहानी है ।पौराणिक महत्व के साथ यह एक व्यावहारिक सच्चाई भी है कि लक्ष्मी की प्रसन्नता सभी के लिए अभीष्ट है। धन वैभव हर किसी को चाहिए। इसलिए उसी अधिष्ठात्री शक्ति की पूजा-आराधना के लिए दीपावली का महापर्व व्यापक रूप से प्रचलित है।
व्यापारी वर्ग दीवाली की प्रतीक्षा में पूरा वर्ष लगा देता है ऐसी मान्यता है कि यदि दीवाली अच्छी हो जाए, तो वह पूरे साल के लिए अच्छे आने का संकेत भी बन जाती है
साथ ही इसका सम्बन्ध व्यापार से भी है। भारत के व्यापारी इसी दिन धन की देवी लक्ष्मी जी का आह्वान करते हुए नए "बही खाते" की शुरुआत करते हैं। इस प्रकार दीवाली से नये व्यापार प्रारम्भ की शुरुआत भी होती है। यह हर आदमी में, हर तरह से, नये उत्साह का संचार भी करती है।
12- दीवाली पर्व का जिक्र तंत्र ग्रंथों में मिलता है। यह पर्व खास तौर से तांत्रिकों, शक्तियों के अर्जन का पर्व है। दस महाविद्याओं में लक्ष्मी पूजन का जिक्र है। इसलिए दीवाली का पर्व शाक्तों का पर्व भी कहा जाता है। शाक्त वे लोग होते हैं, जो मूलतः शक्ति के उपासक होते हैं। वे शक्ति की पूजा कर के अपनी अंतर्निहित शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं।
13- यह पर्व ज्ञान, विवेक एवं मित्रता की लौ जलाने का भी पर्व है । दक्षिण भारत की परंपरा में दीवाली उत्सव की ऐसी मान्यता है ।
हिंदू पुराणों के अनुसार राजा बली एक दयालु दैत्यराज था। वह इतना शक्तिशाली था कि वह स्वर्ग के देवताओं व उनके राज्य के लिए खतरा बन गया। बली की ताकत को खत्म करने के लिए ही भगवान विष्णु एक बौने भिक्षुक ब्राह्मण के रूप में चतुराई से राजा बली से तीन पग के बराबर भूमि मांगी। राजा बली ने खुशी के साथ यह दान दे दिया। राजा बली को कपट से फंसाने के बाद जब भगवान विष्णु ने स्वयं को प्रभु के स्वरूप में पूर्ण वैभव के साथ प्रकट करते हुए अपने पहले पैर से ‘स्वर्ग' व दूसरे पग से ‘पृथ्वी' को नाप लिया तब राजा बली को वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने आत्म समर्पण करते हुए अपना शीश अर्पित करते हुए भगवान विष्णु को अपना तीसरा पग उस पर रखने के लिए आमंत्रित किया। भगवान विष्णु ने अपने अगले पग से उसे अधोलोक में धकेल दिया लेकिन इसके बदले में भगवान विष्णु ने राजा बली को समाज से अंधकार को दूर करने के लिए उसे ज्ञान का दीपक प्रदान किया। उन्होंने उसे यह आशीर्वाद भी दिया कि वह वर्ष में एक बार अपनी जनता के पास अपने एक दीपक से लाखों दीपक जलाने के लिए आएगा ताकि दीपावली की अंधेरी रात से अज्ञान, लोभ, ईर्ष्या, कामना, क्रोध, अहंकार और आलस्य के अंधकार को दूर करते हुए सभी में ज्ञान, विवेक और मित्रता की लौ जलाई जा सके।
14- दिवाली पर जुआ खेलने के रिवाज का भी महत्व है। लोगो को विश्वास है कि इस दिन देवी पार्वती और भगवान शिव ने जुआ पासों से खेले थे। इसी मिथक के साथ पूरे वर्ष समृद्धि पाने के लिये दिवाली की रात इस खेल को खेलते है।
पाँच पर्व का महत्त्व
1- धनतेरस
दीपावली रूपी महापर्व आरम्भ स्वास्थ्य चेतना जगाने के साथ शुरू होता है। दीवाली का शुभारंभ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होता है। इसे धनतेरस कहा जाता है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि की आराधना की जाती है। वस्तुतः यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है।
महर्षि धन्वंतरी को आयुर्वेद व स्वस्थ जीवन प्रदान करने वाले देवता के रूप में भी पूजनीय है, जैसे धन-वैभव के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं, उसी प्रकार स्वस्थ जीवन के लिए स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरी की आराधना की जाती है।
धनतेरस की सायंकाल को यमदेव निमित्त दीपदान किया जाता है। ऐसा करने से यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। मान्यता है कि यदि गृहलक्ष्मी इस दिन दीपदान करें तो पूरे परिवार को रोग-मुक्ति मिलती है और पूरा परिवार स्वस्थ रहता है।
इस दिन पीतल और चाँदी खरीदने चाहिए। पीतल भगवान धन्वंतरी की धातु है। पीतल खरीदने से घर में आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।इस दिन चांदी खरीदने की भी परंपरा है। चांदी को चन्द्रमा का प्रतीक मानते हैं जो शीतलता प्रदान करती है जिससे मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। चाँदी कुबेर की धातु है। इस दिन चाँदी खरीदने से घर में यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और संपदा में वृद्धि होती है।
व्यापारी वर्ग इस दिन नए बहीखाते खरीदता है और इन्हें गद्दी पर स्थापित करते है। तत्पश्चात दिवाली पर इनका पूजन किया जाता है। इस प्रकार देवी लक्ष्मीजी के आह्वान का भी यही दिन होता है।
देवताओं के वैद्य माने जाने वाले धन्वन्तरि, चिकित्सा के भी देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए भी धनतेरस का विशेष महत्व है।
आयुर्वेद चिकित्सक अपने चिकित्सालय पर धनतेरस के दिन धन्वंतरी देव की विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। पुरातनकाल से अधिकांश आयुर्वेदिक औषधियों का इसी दिन निर्माण और अभिमंत्रित करने का भी प्रचलन है।
धार्मिक व पौराणिक मान्यता यह है कि सागर मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश के साथ अवतरित हुए थे और इस घटना के प्रतीक स्वरूप ही बर्तन खरीदने की परम्परा का प्रचलन हुआ। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन चल या अचल संपत्ति खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है।
पौराणिक मान्यता यह है कि माँ लक्ष्मी को विष्णु जी का श्राप दिया था कि उन्हें 13 वर्षों तक किसान के घर में रहना होगा। श्राप के दौरान किसान का घर धनसंपदा से भर गया। लेकिन श्राप से मुक्ति के उपरांत जब विष्णुजी लक्ष्मी को लेने आए तब किसान ने उन्हें रोकना चाहा। लक्ष्मीजी ने कहा कल त्रयोदशी है तुम साफ-सफाई करना, दीप जलाना और मेरा आह्वान करना। किसान ने ऐसा ही किया और लक्ष्मी की फिर से कृपा प्राप्त हुई । तभी से लक्ष्मी पूजन की प्रथा का प्रचलन आरंभ हुआ।
धन तेरस के दिनखेती करने वाले किसान धनिये के बीज खरीदते हैं। दिवाली के बाद इन बीजों को वे अपने खेतों में बो देते हैं। ग्रामीण इलाकों में इस दिन लोग अपने पशुओं की पूजा करते हैं क्यों की यह आजीविका चलाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन मानते परंपरागत काल मे थे।
धनतेरस की सांय घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जला कर देवी लक्ष्मी का आह्वान करते है और इसी के साथ दीपावली का शुभारंभ होता है। दिवाली के पहले दिन का संबंध धन वैभव और सम्पदा से जोड़ा गया है।
2- नरक चतुर्दशी
दूसरे दिन चतुर्दशी को नरक-चौदस मनाया जाता है। इसे छोटी दीवाली भी कहा जाता है। इस दिन एक पुराने दीपक में सरसों का तेल व पाँच अन्न के दाने डाल कर इसे घर की नाली ओर जलाकर रखा जाता है। यह दीपक यम दीपक कहलाता है।
इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करना चाहिए और उसके बाद भगवन विष्णु और कृष्ण के दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।अर्थात यह दिन अपने रूप-रंग को संवारने की भी मान्यता लिए है।
इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं.
इसके पीछे एक पौराणिक कथा हैं ।
एक प्रतापी राजा थे जिनका नाम रन्ति देव था । स्वभाव से बहुत ही शांत एवम पुण्य आत्मा, इन्होने कभी भी गलती से भी किसी का अहित नहीं किया । अपनी मृत्यु के समय जब इन्होंने यम दूत को देखा तो इन्हें पता चला कि इन्हें मोक्ष नहीं बल्कि नरक मिला हैं । तब उन्होंने पूछा कि जब मैंने कोई पाप नहीं किया तो मुझे नरक क्यूँ भोगना पड़ रहा हैं । उन्होंने यमदूतों से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया एक बार अज्ञानवश आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा चला गया था | उसी के कारण आपका नरक योग हैं । तब राजा रन्ति से हाथ जोड़कर यमराज से कुछ समय देने को कहा ताकि वे अपनी करनी सुधार सके ।उनके अच्छे आचरण के कारण उन्हें यह मौका मिला। तब राजा रन्ति ने अपने गुरु के पास गए । गुरु ने उन्हें सलाह दी कि वे हजार ब्राह्मणों को भोज कराये और उनसे क्षमा मांगे । उनके इस कार्य से सभी ब्राह्मण प्रसन्न हुए और उनके आशीर्वाद के फल से रन्ति देव को मोक्ष मिला ।वह दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस का था, इसलिए इस दिन को नरक निवारण चतुर्दशी कहते है।
नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। पौराणिक कहानी के अनुसार एक हिरण्यगर्भ नामक एक राजा थे जिन्होंने अपना राज पाठ छोड़कर तप में अपना जीवन व्यतीत करने का निर्णय किया । उन्होंने कई वर्षो तक जंगल मे तपस्या की, लेकिन उनके शरीर पर कीड़े लग गए और शरीर काले और सड़ गया सा दिखने लगा। जिसके कारण राजा बहुत दुःख थे उन्होंने इससे निजात पाने के लिए नारद मुनि से अपनी व्यथा कही । तब नारद मुनि ने इसका कारण बताया कि आप योग साधना के दौरान शरीर की स्थिती सही नहीं रखते इसलिए ऐसा परिणाम सामने आया और निवारण कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगा कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करे साथ ही रूप के देवता श्री कृष्ण की पूजा कर उनकी आरती करे, इससे आपको पुन: खोया हुआ सौन्दर्य प्राप्त होगा। राजा नै यही कर अपने शरीर को स्वस्थ किया। इस प्रकार इस दिन को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं ।
चूकि नरक चतुर्दशी दिवाली के एक दिन पहले मनाया जाता हैं जिसमे इसमें भी द्वार पर दीपक जलाये जाते है । इसी कारण इसे छोटी दीवाली कहते हैं ।
नरक चतुर्दशी हनुमान जयंती के रूप मे भी मनायी जाती है। ऐसी मान्यता हैं कि इस दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस के दिन हनुमान जी ने माता अंजना के गर्भ से जन्म लिया था । अतः इस दिन दुखों एवम कष्टों से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की पूजा की जाती हैं जिसमे कई लोग हनुमान चालीसा, हनुमानअष्टक का पाठ किया जाता है।
3- दीपावली
तीसरे दिन अमावस्या को दीवाली का त्योहार पूरे भारतवर्ष के अतिरिक्त विश्वभर में बसे भारतीय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है। यह भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न तरीकों से मनाया जाता है।
4- अन्नकूट या गोवर्धन पूजा
दीवाली के पश्चात अगले दिन अन्नकूट मनाया जाता है। यह दीवाली की श्रृंखला में चौथा उत्सव होता है जो कि कार्तिक माह की प्रतिपदा तिथि के दौरान मनाया जाता है।
हिन्दु कैलेण्डर में गोवर्धन पूजा का दिन अमावस्या तिथि के एक दिन पहले भी पड़ सकता है। इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र देवता को पराजित किये जाने की मान्यता है । इसलिए लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं।
यह दिवस यह सन्देश देता हैं कि हमारा जीवन मे प्रकृति प्रदत्त हर एक चीज़ महत्वपूर्ण है जिस पर हमारा जीबन निर्भर करता हैं । प्रकृति प्रदत्त चीजे जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, नदी और पर्वत आदि से हमारा जीबन चलता है इसलिए हमें उन सभी धन्यवाद देना चाहिये | इस प्रकार यह पर्व इन सभी प्राकृतिक धन सम्पति के प्रति हमारी नमन की भावना को व्यक्त करता हैं |
इस दिन विशेष रूप से गाय माता की पूजा का महत्व होता हैं | उनके दूध, घी, छांछ, दही, मक्खन यहाँ तक की गोबर एवम मूत्र से भी मानव जाति का कल्याण हुआ हैं | ऐसे में गाय की इस दिन पूजा की जाती है।
इस दिन गोधन कूटने की प्रथा है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियां घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं। दोपहर पर्यन्त यह सब करके बहन भाई पूजा विधान से इस पर्व को प्रसन्नता से मनाते हैं।
गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। इस दिन गेहूँ, चावल जैसे अनाज, बेसन से बनी कढ़ी और पत्ते वाली सब्जियों से बने भोजन को पकाया जाता है और भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है। आज कई जगहों में इसने विशाल भोज का स्वरुप धारण कर लिया है आज कल इसे आधुनिक युग में पार्टी की तरह मनाया जाने लगा गया है।
महाराष्ट्र में यह दिन बालि प्रतिपदा या बालि पड़वा के रूप में मनाया जाता है। वामन जो कि भगवान विष्णु के एक अवतार है, उनकी राजा बालि पर विजय और बाद में बालि को पाताल लोक भेजने के कारण इस दिन उनका स्मरण किया जाता है। यह माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बालि इस दिन पातल लोक से पृथ्वी लोक आता है।
गोवर्धन पूजा का दिन गुजराती नव वर्ष के दिन के साथ भी जुड़ता है जो कि कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष के दौरान मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा उत्सव गुजराती नव वर्ष के दिन के एक दिन पहले मनाया जा सकता है।
ऐसी मान्यता है कि कुछ भी हो जाए, इस दिन खुश रहना चाहिए क्यों कि यदि कोई किसी भी कारण से दु:खी या अप्रसन्न रहता है, तो वर्ष भर दु:खी ही रहता है। इसलिए यह पर्व प्रसन्नता / ख़ुशी का दिन भी कहा जा सकता है।
ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन स्नान से पूर्व पूरे शरीर में सरसों का तेल लगाकर स्नान करने से आयु व आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा दु:ख व दरिद्रता का नाश होता है।
5- भैया दूज
हिन्दू धर्म में भाई-बहन के स्नेह-प्रतीक दो त्योहार मनाये जाते हैं -
एक रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है।
दूसरा त्योहार, 'भाई दूज' का होता है।
दिवाली के दो दिन बाद शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है।
इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनके लम्बे और स्वस्थ तथा सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं और भाई अपनी बहनों को उपहार प्रदान करते हैं। भाई दूज का यह त्योहार भाई बहन के स्नेह और प्रेम के पवित्र भाव को सुदृढ़ करता है।
इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। और बहनें भाइयों को तेल लगाकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। यदि गंगा यमुना में नहीं नहाया जा सके तो भाई को बहन के घर नहाना चाहिए। इसका लक्ष्य भाई की उम्र बढ़ना और जीवन के कष्ट दूर करना है।
इस दिन बहन के घर भोजन मे चावल का सेवन करने का विशेष महत्व है। बहन चचेरी अथवा ममेरी कोई भी हो सकती है। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि किसी स्त्रीलिंग पदार्थ का ध्यान करके या उसके पास बैठ कर भोजन करना शुभ माना जाता है।
भारत मे त्यौहार का लक्ष्य प्रेम के रिश्ते को और बढ़ाना है। कई पौराणिक कथाओं से सिद्ध हुआ हैं कि भाई बहन का रिश्ता सदैव एक दुसरे में प्राण न्यौछावर के लिए तैयार रहता हैं. भाई दूज की परंपरा में ऐसी ही मान्यता हैं, जिसमे बहन अपने भाई की सारी विपत्तियों को पहले स्वयं पर लेती हैं. अपने भाई की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करती हैं और बदले में उससे कुछ नहीं मांगती।
निष्कर्ष -
इस प्रकार आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक और बौद्धिक लाभ और परम लाभ पहुचाने वाले उत्सवों का नाम है दिवाली का उत्सव।
इसमे सामाजिकता को आध्यात्मीकता से जोड़ा गया है।
इसमे खुशी को आनंद से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को समाज से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को लोक से जोड़ा गया है।
इसमे छोटो और बड़ो दोनों को जोड़ा गया है।
इसमे स्वास्थ्य को सम्पदा से प्राथमिक मान कर जोड़ा गया है।
इसमे सुख को स्वास्थ्य से जोड़ा गया है।
इसमें व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य को पशुओं से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य की मनुष्य से जोड़ा गया है।
मनुष्य को उसके देवत्व से जोड़ा गया है
इसमे कुछ चीजो को बाहर निकलने और कुछ चीजो को अंदर लाने से जोड़ा गया है।
इसमे बाह्य और आतंरिक दोनों को प्रकाशित करने पर बल दिया गया है
आइये इसी रूप मे प्राकृतिक रूप से दीपावली मनाये ..
आप सभी को प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ।
आप सभी की जय हो ..दुखो और कष्टों पर विजय मिले । जीबन का हर पल प्रकाश से आलोकित हो
हर सांस मे व्यक्ति और समाज का मंगल हो.----
त्योहार या उत्सव हमारे सुख आनंद और हर्षोल्लास के प्रतीक है जो परिस्थिति के अनुसार अपने रंग-रुप और आकार में भिन्न होते हैं। त्योहार मनाने के तरीके भिन्न भिन्न हो सकते है किंतु इनका मूल अभिप्राय आनंद और ऊर्जा प्राप्ति ही होता है।
लगभग सभी त्योहारों का कोई न कोई पौराणिक महत्व है जिनका अधिकतर भाग आस्था से जुड़ा होता है। यह संभव हो पौराणिक कथाएं प्रतीकात्मक महत्व की हो क्यों कि इनका मकसद सामाजिक व्यवस्था का नियमन एवं संचालन होता है।
कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इसे दीवाली भी कहते है।
वास्तव मे दीवाली सिर्फ एक दिन का त्योहार न होकर, त्योहारों की एक श्रृंखला है। जिसके साथ पांच पर्वों जुड़े हैं। जो कि दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।
सभी पर्वों की अलग अलग धार्मिक, पौराणिक महत्त्व है ।जिसके पीछे अलग अलग दंत-कथाएं भी है ।
भारत में दीपावाली त्यौहार का महत्व
1- हिन्दू मान्यता के अनुसार दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास को खत्म कर घर लौटे थे। अपने प्रिय राजा के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए थे। तब से लेकर आज तक यह प्रकाश-पर्व के रूप मे भारतीय उपमहाद्वीप में बड़े ही हर्ष व उल्लास के साथ मनाया जाता है।
2- भारतीय परंपरा मे ये मान्यता है कि सत्य की सदा जीत होती है। दीपावली का वास्तविक भाव भी यही है ।
असतो मा सद्गगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय। इस प्रकार दीपावली व्यक्ति को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व है। आज भी प्रत्येक दीपावली के दिन एक दीपक से ही दूसरा दीपक जलाया जाता है और इन दीपों से निकलने वाला यह प्रकाश सदियों से व्यक्ति और उसके समाज को शांति व भाइचारे का संदेश देता आ रही है। दिवाली अच्छाई की बुराई के ऊपर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन लोग आपसी दुश्मनी दूर करने और प्यार और दोस्ती को बढाने के लिये इस दिन मिठाई और उपहार वितरित करते है।
3- कृष्णपंथ के मतानुयायी मानते है कि इस दिन द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण ने चतुर्दशी (दिवाली से एक दिन पहले) को बुराई के प्रतीक राक्षस नरकासुर के ऊपर विजय की थी जिसके उपलक्ष्य में दिवाली को मनाया जाता है।
4- यह पांडवो के 12 वर्ष के निष्कासन के साथ साथ 1 वर्ष के अज्ञातवास अर्थात् छुप कर रहना से वापस घर आने के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है।
5- एक पौराणिक मान्यता के अनुसार विष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था
6- जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने 527 ई0पू0 मोक्ष या निर्वाण प्राप्ति किया था जिसके उपलक्ष्य में यह पर्व मनाया जाता है, और आर्य समाजवादियों द्वारा महावीर स्वामी की मृत्यु की वर्षगांठ या शरदीया नव-शयष्टी के रुप में मनाया जाता है।
7- सिक्ख धर्म मे भी अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और इस दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द जी को जेल से रिहा किया गया था।
8- हिन्दू कलैण्डर के अनुसार दिवाली (अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष का अन्तिम दिन) पर मारवाङी अपना नया साल मनाते है।
9- गुजराती भी चन्द्र कलैण्डर (कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष के पहले दिन) के अनुसार दिवाली से एक दिन बाद अपना नया साल मनाते है।
10- आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दीपावली बंधनसे मुक्ति का दिन है। व्यक्ति के अंदर अज्ञानरूप अंधकार का साम्राज्य है। दीपक को आत्म ज्योति का प्रतीक भी माना जाता है। अतः दीप जलाने का तात्पर्य है- अपने अंतर को ज्ञान के प्रकाश से भर लेना, जिससे हृदय और मन जगमगा उठे। इस दिन चतुर्दिक तमस् में ज्योति की आभा फैलती एवं बिखरती है। अंधकार से सतत् प्रकाश की ओर बढ़ते रहना ही इस महापर्व की प्रेरणा है। इसलिए सभी स्थानों पर सरसो के तेल के दीयें जलाने से बुरी ऊर्जा जल कर नष्ट होगी और अच्छी ऊर्जा आकर्षित होगी। इस प्रकार आध्यात्मिकता की दृष्टि से यह जागरूकता और भीतर के प्रकाश के जश्न का त्यौहार है।
शुद्ध आत्मा, समृद्धि और भगवान के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिये अपने अंदर और बाहर जैसे घरों, कार्यालयों और अन्य काम के स्थानों की साफ सफाई और रंगरोगन का त्यौहार है। साल भर की गन्दगी की घर से बाहर निकलने से नकारात्मक ऊर्जा की समाप्ति के साथ सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
बुराई को दूर करने के लिए लोग बहुत तेज ध्वनि करते है और हर जगह रोशनी का प्रयोग करने है इसका अपना एक विशेष महत्व है।
लोग पूरे वर्ष के लिए अच्छा स्वास्थ्य, धन, ज्ञान, शांति, समृद्धि प्राप्त करने के मिथक में पटाखों का प्रयोग करते है। इनका प्रयोग से उच्च श्रेणी विभिन्न फ्रीकेन्सी की ध्वनि निकलती है जो कि लोगों की असली खुशी का संकेत है। दूसरी ओर पटाखों से निकला धूआ बरसात के मौसम के बाद उत्पन्न हुये बहुत से कीडों को मारता है। लेकिन आज यह तेज आवाज और खतरनाक पटाखों का उत्सव बनता जा रहा है लेकिन दिवाली पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का पर्व नहीं है।
लेकिन दीवाली त्योहार का मतलब सिर्फ पटाखा फोड़ना नहीं होता है। जरा सोचिए पटाखों के कारण कितने दमें के मरीज खाँसते-खाँसते बीमार हो जाते है । कितने ही घरों में आग लग जाती है और कितने लोग पटाखों के कारण घायल और मृत हो जाते है।
वास्तव मे दिवाली पर्व है प्रकाश का । यह पर्व समाज से अंधकार को समाप्त कर उल्लास, भाईचारे व प्रेम का संदेश फैलाने की प्रेरणा देता है न कि खतरनाक पटाखों को जलाकर प्रदूषण फैलाने का। यह पर्व है साफसफाई और घरों को सजाने का । लोग अपने घर और ह्रदय को आशीर्वाद, बुद्धि और धन का स्वागत करने के लिये गन्दगी बाहर निकलते है। सजाते है. रंगोली बनाते है, दरवाजे पर पर्दे लगाते है, इस दिन देवी लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा करते है।
11- दीवाली का पर्व लक्ष्मी जयंती का पर्व भी है। कमला जयंती, लक्ष्मी जयंती के लिये भी प्रसिद्ध है। लक्ष्मी का संबंध सुख, संपत्ति, समृद्धि, वैभव आदि से है।
दीपावली का सीधा संबंध लक्ष्मी पूजा के रूप में है। समुद्र मंथन के समय 14 रत्न निकले थे, जिनमें पहले रत्न लक्ष्मी अर्थात् ‘श्री’ के प्रकट होने की कहानी है ।पौराणिक महत्व के साथ यह एक व्यावहारिक सच्चाई भी है कि लक्ष्मी की प्रसन्नता सभी के लिए अभीष्ट है। धन वैभव हर किसी को चाहिए। इसलिए उसी अधिष्ठात्री शक्ति की पूजा-आराधना के लिए दीपावली का महापर्व व्यापक रूप से प्रचलित है।
व्यापारी वर्ग दीवाली की प्रतीक्षा में पूरा वर्ष लगा देता है ऐसी मान्यता है कि यदि दीवाली अच्छी हो जाए, तो वह पूरे साल के लिए अच्छे आने का संकेत भी बन जाती है
साथ ही इसका सम्बन्ध व्यापार से भी है। भारत के व्यापारी इसी दिन धन की देवी लक्ष्मी जी का आह्वान करते हुए नए "बही खाते" की शुरुआत करते हैं। इस प्रकार दीवाली से नये व्यापार प्रारम्भ की शुरुआत भी होती है। यह हर आदमी में, हर तरह से, नये उत्साह का संचार भी करती है।
12- दीवाली पर्व का जिक्र तंत्र ग्रंथों में मिलता है। यह पर्व खास तौर से तांत्रिकों, शक्तियों के अर्जन का पर्व है। दस महाविद्याओं में लक्ष्मी पूजन का जिक्र है। इसलिए दीवाली का पर्व शाक्तों का पर्व भी कहा जाता है। शाक्त वे लोग होते हैं, जो मूलतः शक्ति के उपासक होते हैं। वे शक्ति की पूजा कर के अपनी अंतर्निहित शक्ति को बढ़ाना चाहते हैं।
13- यह पर्व ज्ञान, विवेक एवं मित्रता की लौ जलाने का भी पर्व है । दक्षिण भारत की परंपरा में दीवाली उत्सव की ऐसी मान्यता है ।
हिंदू पुराणों के अनुसार राजा बली एक दयालु दैत्यराज था। वह इतना शक्तिशाली था कि वह स्वर्ग के देवताओं व उनके राज्य के लिए खतरा बन गया। बली की ताकत को खत्म करने के लिए ही भगवान विष्णु एक बौने भिक्षुक ब्राह्मण के रूप में चतुराई से राजा बली से तीन पग के बराबर भूमि मांगी। राजा बली ने खुशी के साथ यह दान दे दिया। राजा बली को कपट से फंसाने के बाद जब भगवान विष्णु ने स्वयं को प्रभु के स्वरूप में पूर्ण वैभव के साथ प्रकट करते हुए अपने पहले पैर से ‘स्वर्ग' व दूसरे पग से ‘पृथ्वी' को नाप लिया तब राजा बली को वास्तविकता का ज्ञान हुआ और उन्होंने आत्म समर्पण करते हुए अपना शीश अर्पित करते हुए भगवान विष्णु को अपना तीसरा पग उस पर रखने के लिए आमंत्रित किया। भगवान विष्णु ने अपने अगले पग से उसे अधोलोक में धकेल दिया लेकिन इसके बदले में भगवान विष्णु ने राजा बली को समाज से अंधकार को दूर करने के लिए उसे ज्ञान का दीपक प्रदान किया। उन्होंने उसे यह आशीर्वाद भी दिया कि वह वर्ष में एक बार अपनी जनता के पास अपने एक दीपक से लाखों दीपक जलाने के लिए आएगा ताकि दीपावली की अंधेरी रात से अज्ञान, लोभ, ईर्ष्या, कामना, क्रोध, अहंकार और आलस्य के अंधकार को दूर करते हुए सभी में ज्ञान, विवेक और मित्रता की लौ जलाई जा सके।
14- दिवाली पर जुआ खेलने के रिवाज का भी महत्व है। लोगो को विश्वास है कि इस दिन देवी पार्वती और भगवान शिव ने जुआ पासों से खेले थे। इसी मिथक के साथ पूरे वर्ष समृद्धि पाने के लिये दिवाली की रात इस खेल को खेलते है।
पाँच पर्व का महत्त्व
1- धनतेरस
दीपावली रूपी महापर्व आरम्भ स्वास्थ्य चेतना जगाने के साथ शुरू होता है। दीवाली का शुभारंभ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होता है। इसे धनतेरस कहा जाता है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि की आराधना की जाती है। वस्तुतः यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है।
महर्षि धन्वंतरी को आयुर्वेद व स्वस्थ जीवन प्रदान करने वाले देवता के रूप में भी पूजनीय है, जैसे धन-वैभव के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं, उसी प्रकार स्वस्थ जीवन के लिए स्वास्थ्य के देवता धन्वंतरी की आराधना की जाती है।
धनतेरस की सायंकाल को यमदेव निमित्त दीपदान किया जाता है। ऐसा करने से यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। मान्यता है कि यदि गृहलक्ष्मी इस दिन दीपदान करें तो पूरे परिवार को रोग-मुक्ति मिलती है और पूरा परिवार स्वस्थ रहता है।
इस दिन पीतल और चाँदी खरीदने चाहिए। पीतल भगवान धन्वंतरी की धातु है। पीतल खरीदने से घर में आरोग्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।इस दिन चांदी खरीदने की भी परंपरा है। चांदी को चन्द्रमा का प्रतीक मानते हैं जो शीतलता प्रदान करती है जिससे मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। चाँदी कुबेर की धातु है। इस दिन चाँदी खरीदने से घर में यश, कीर्ति, ऐश्वर्य और संपदा में वृद्धि होती है।
व्यापारी वर्ग इस दिन नए बहीखाते खरीदता है और इन्हें गद्दी पर स्थापित करते है। तत्पश्चात दिवाली पर इनका पूजन किया जाता है। इस प्रकार देवी लक्ष्मीजी के आह्वान का भी यही दिन होता है।
देवताओं के वैद्य माने जाने वाले धन्वन्तरि, चिकित्सा के भी देवता माने जाते हैं इसलिए चिकित्सकों के लिए भी धनतेरस का विशेष महत्व है।
आयुर्वेद चिकित्सक अपने चिकित्सालय पर धनतेरस के दिन धन्वंतरी देव की विशेष पूजा का आयोजन करते हैं। पुरातनकाल से अधिकांश आयुर्वेदिक औषधियों का इसी दिन निर्माण और अभिमंत्रित करने का भी प्रचलन है।
धार्मिक व पौराणिक मान्यता यह है कि सागर मंथन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश के साथ अवतरित हुए थे और इस घटना के प्रतीक स्वरूप ही बर्तन खरीदने की परम्परा का प्रचलन हुआ। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन चल या अचल संपत्ति खरीदने से उसमें 13 गुणा वृद्धि होती है।
पौराणिक मान्यता यह है कि माँ लक्ष्मी को विष्णु जी का श्राप दिया था कि उन्हें 13 वर्षों तक किसान के घर में रहना होगा। श्राप के दौरान किसान का घर धनसंपदा से भर गया। लेकिन श्राप से मुक्ति के उपरांत जब विष्णुजी लक्ष्मी को लेने आए तब किसान ने उन्हें रोकना चाहा। लक्ष्मीजी ने कहा कल त्रयोदशी है तुम साफ-सफाई करना, दीप जलाना और मेरा आह्वान करना। किसान ने ऐसा ही किया और लक्ष्मी की फिर से कृपा प्राप्त हुई । तभी से लक्ष्मी पूजन की प्रथा का प्रचलन आरंभ हुआ।
धन तेरस के दिनखेती करने वाले किसान धनिये के बीज खरीदते हैं। दिवाली के बाद इन बीजों को वे अपने खेतों में बो देते हैं। ग्रामीण इलाकों में इस दिन लोग अपने पशुओं की पूजा करते हैं क्यों की यह आजीविका चलाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन मानते परंपरागत काल मे थे।
धनतेरस की सांय घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जला कर देवी लक्ष्मी का आह्वान करते है और इसी के साथ दीपावली का शुभारंभ होता है। दिवाली के पहले दिन का संबंध धन वैभव और सम्पदा से जोड़ा गया है।
2- नरक चतुर्दशी
दूसरे दिन चतुर्दशी को नरक-चौदस मनाया जाता है। इसे छोटी दीवाली भी कहा जाता है। इस दिन एक पुराने दीपक में सरसों का तेल व पाँच अन्न के दाने डाल कर इसे घर की नाली ओर जलाकर रखा जाता है। यह दीपक यम दीपक कहलाता है।
इस दिन के महत्व के बारे में कहा जाता है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करना चाहिए और उसके बाद भगवन विष्णु और कृष्ण के दर्शन करना करना चाहिए। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।अर्थात यह दिन अपने रूप-रंग को संवारने की भी मान्यता लिए है।
इस दिन रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है। घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिए को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है। पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं.
इसके पीछे एक पौराणिक कथा हैं ।
एक प्रतापी राजा थे जिनका नाम रन्ति देव था । स्वभाव से बहुत ही शांत एवम पुण्य आत्मा, इन्होने कभी भी गलती से भी किसी का अहित नहीं किया । अपनी मृत्यु के समय जब इन्होंने यम दूत को देखा तो इन्हें पता चला कि इन्हें मोक्ष नहीं बल्कि नरक मिला हैं । तब उन्होंने पूछा कि जब मैंने कोई पाप नहीं किया तो मुझे नरक क्यूँ भोगना पड़ रहा हैं । उन्होंने यमदूतों से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया एक बार अज्ञानवश आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा चला गया था | उसी के कारण आपका नरक योग हैं । तब राजा रन्ति से हाथ जोड़कर यमराज से कुछ समय देने को कहा ताकि वे अपनी करनी सुधार सके ।उनके अच्छे आचरण के कारण उन्हें यह मौका मिला। तब राजा रन्ति ने अपने गुरु के पास गए । गुरु ने उन्हें सलाह दी कि वे हजार ब्राह्मणों को भोज कराये और उनसे क्षमा मांगे । उनके इस कार्य से सभी ब्राह्मण प्रसन्न हुए और उनके आशीर्वाद के फल से रन्ति देव को मोक्ष मिला ।वह दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस का था, इसलिए इस दिन को नरक निवारण चतुर्दशी कहते है।
नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। पौराणिक कहानी के अनुसार एक हिरण्यगर्भ नामक एक राजा थे जिन्होंने अपना राज पाठ छोड़कर तप में अपना जीवन व्यतीत करने का निर्णय किया । उन्होंने कई वर्षो तक जंगल मे तपस्या की, लेकिन उनके शरीर पर कीड़े लग गए और शरीर काले और सड़ गया सा दिखने लगा। जिसके कारण राजा बहुत दुःख थे उन्होंने इससे निजात पाने के लिए नारद मुनि से अपनी व्यथा कही । तब नारद मुनि ने इसका कारण बताया कि आप योग साधना के दौरान शरीर की स्थिती सही नहीं रखते इसलिए ऐसा परिणाम सामने आया और निवारण कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगा कर सूर्योदय से पूर्व स्नान करे साथ ही रूप के देवता श्री कृष्ण की पूजा कर उनकी आरती करे, इससे आपको पुन: खोया हुआ सौन्दर्य प्राप्त होगा। राजा नै यही कर अपने शरीर को स्वस्थ किया। इस प्रकार इस दिन को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं ।
चूकि नरक चतुर्दशी दिवाली के एक दिन पहले मनाया जाता हैं जिसमे इसमें भी द्वार पर दीपक जलाये जाते है । इसी कारण इसे छोटी दीवाली कहते हैं ।
नरक चतुर्दशी हनुमान जयंती के रूप मे भी मनायी जाती है। ऐसी मान्यता हैं कि इस दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस के दिन हनुमान जी ने माता अंजना के गर्भ से जन्म लिया था । अतः इस दिन दुखों एवम कष्टों से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की पूजा की जाती हैं जिसमे कई लोग हनुमान चालीसा, हनुमानअष्टक का पाठ किया जाता है।
3- दीपावली
तीसरे दिन अमावस्या को दीवाली का त्योहार पूरे भारतवर्ष के अतिरिक्त विश्वभर में बसे भारतीय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है। यह भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न तरीकों से मनाया जाता है।
4- अन्नकूट या गोवर्धन पूजा
दीवाली के पश्चात अगले दिन अन्नकूट मनाया जाता है। यह दीवाली की श्रृंखला में चौथा उत्सव होता है जो कि कार्तिक माह की प्रतिपदा तिथि के दौरान मनाया जाता है।
हिन्दु कैलेण्डर में गोवर्धन पूजा का दिन अमावस्या तिथि के एक दिन पहले भी पड़ सकता है। इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र देवता को पराजित किये जाने की मान्यता है । इसलिए लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं।
यह दिवस यह सन्देश देता हैं कि हमारा जीवन मे प्रकृति प्रदत्त हर एक चीज़ महत्वपूर्ण है जिस पर हमारा जीबन निर्भर करता हैं । प्रकृति प्रदत्त चीजे जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, नदी और पर्वत आदि से हमारा जीबन चलता है इसलिए हमें उन सभी धन्यवाद देना चाहिये | इस प्रकार यह पर्व इन सभी प्राकृतिक धन सम्पति के प्रति हमारी नमन की भावना को व्यक्त करता हैं |
इस दिन विशेष रूप से गाय माता की पूजा का महत्व होता हैं | उनके दूध, घी, छांछ, दही, मक्खन यहाँ तक की गोबर एवम मूत्र से भी मानव जाति का कल्याण हुआ हैं | ऐसे में गाय की इस दिन पूजा की जाती है।
इस दिन गोधन कूटने की प्रथा है। गोबर की मानव मूर्ति बना कर छाती पर ईंट रखकर स्त्रियां उसे मूसलों से तोड़ती हैं। स्त्रियां घर-घर जाकर चना, गूम तथा भटकैया चराव कर जिव्हा को भटकैया के कांटे से दागती भी हैं। दोपहर पर्यन्त यह सब करके बहन भाई पूजा विधान से इस पर्व को प्रसन्नता से मनाते हैं।
गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। इस दिन गेहूँ, चावल जैसे अनाज, बेसन से बनी कढ़ी और पत्ते वाली सब्जियों से बने भोजन को पकाया जाता है और भगवान कृष्ण को अर्पित किया जाता है। आज कई जगहों में इसने विशाल भोज का स्वरुप धारण कर लिया है आज कल इसे आधुनिक युग में पार्टी की तरह मनाया जाने लगा गया है।
महाराष्ट्र में यह दिन बालि प्रतिपदा या बालि पड़वा के रूप में मनाया जाता है। वामन जो कि भगवान विष्णु के एक अवतार है, उनकी राजा बालि पर विजय और बाद में बालि को पाताल लोक भेजने के कारण इस दिन उनका स्मरण किया जाता है। यह माना जाता है कि भगवान वामन द्वारा दिए गए वरदान के कारण असुर राजा बालि इस दिन पातल लोक से पृथ्वी लोक आता है।
गोवर्धन पूजा का दिन गुजराती नव वर्ष के दिन के साथ भी जुड़ता है जो कि कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष के दौरान मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा उत्सव गुजराती नव वर्ष के दिन के एक दिन पहले मनाया जा सकता है।
ऐसी मान्यता है कि कुछ भी हो जाए, इस दिन खुश रहना चाहिए क्यों कि यदि कोई किसी भी कारण से दु:खी या अप्रसन्न रहता है, तो वर्ष भर दु:खी ही रहता है। इसलिए यह पर्व प्रसन्नता / ख़ुशी का दिन भी कहा जा सकता है।
ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन स्नान से पूर्व पूरे शरीर में सरसों का तेल लगाकर स्नान करने से आयु व आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा दु:ख व दरिद्रता का नाश होता है।
5- भैया दूज
हिन्दू धर्म में भाई-बहन के स्नेह-प्रतीक दो त्योहार मनाये जाते हैं -
एक रक्षाबंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसमें भाई बहन की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है।
दूसरा त्योहार, 'भाई दूज' का होता है।
दिवाली के दो दिन बाद शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है।
इस दिन बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनके लम्बे और स्वस्थ तथा सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं और भाई अपनी बहनों को उपहार प्रदान करते हैं। भाई दूज का यह त्योहार भाई बहन के स्नेह और प्रेम के पवित्र भाव को सुदृढ़ करता है।
इस दिन बहनें बेरी पूजन भी करती हैं। और बहनें भाइयों को तेल लगाकर गंगा यमुना में स्नान भी कराती हैं। यदि गंगा यमुना में नहीं नहाया जा सके तो भाई को बहन के घर नहाना चाहिए। इसका लक्ष्य भाई की उम्र बढ़ना और जीवन के कष्ट दूर करना है।
इस दिन बहन के घर भोजन मे चावल का सेवन करने का विशेष महत्व है। बहन चचेरी अथवा ममेरी कोई भी हो सकती है। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि किसी स्त्रीलिंग पदार्थ का ध्यान करके या उसके पास बैठ कर भोजन करना शुभ माना जाता है।
भारत मे त्यौहार का लक्ष्य प्रेम के रिश्ते को और बढ़ाना है। कई पौराणिक कथाओं से सिद्ध हुआ हैं कि भाई बहन का रिश्ता सदैव एक दुसरे में प्राण न्यौछावर के लिए तैयार रहता हैं. भाई दूज की परंपरा में ऐसी ही मान्यता हैं, जिसमे बहन अपने भाई की सारी विपत्तियों को पहले स्वयं पर लेती हैं. अपने भाई की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की प्रार्थना करती हैं और बदले में उससे कुछ नहीं मांगती।
निष्कर्ष -
इस प्रकार आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक और बौद्धिक लाभ और परम लाभ पहुचाने वाले उत्सवों का नाम है दिवाली का उत्सव।
इसमे सामाजिकता को आध्यात्मीकता से जोड़ा गया है।
इसमे खुशी को आनंद से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को समाज से जोड़ा गया है।
इसमे व्यक्ति को लोक से जोड़ा गया है।
इसमे छोटो और बड़ो दोनों को जोड़ा गया है।
इसमे स्वास्थ्य को सम्पदा से प्राथमिक मान कर जोड़ा गया है।
इसमे सुख को स्वास्थ्य से जोड़ा गया है।
इसमें व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य को पशुओं से जोड़ा गया है।
इसमे मनुष्य की मनुष्य से जोड़ा गया है।
मनुष्य को उसके देवत्व से जोड़ा गया है
इसमे कुछ चीजो को बाहर निकलने और कुछ चीजो को अंदर लाने से जोड़ा गया है।
इसमे बाह्य और आतंरिक दोनों को प्रकाशित करने पर बल दिया गया है
आइये इसी रूप मे प्राकृतिक रूप से दीपावली मनाये ..
आप सभी को प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ।
आप सभी की जय हो ..दुखो और कष्टों पर विजय मिले । जीबन का हर पल प्रकाश से आलोकित हो
हर सांस मे व्यक्ति और समाज का मंगल हो.----