Sunday, October 16, 2016

अरुणिमा सिन्हा : संघर्ष की जीवित प्रतिमूर्ति

अरुणिमा सिन्हा : संघर्ष की जीवित प्रतिमूर्ति

जीवन प्रतिकूलताओं का संजाल है इसी कारण जीबन मे संघर्ष भी है यह संघर्ष ही हमें सामर्थ्यवान और महान बनाता है ।

चाहे राम हो पांडव सभी ने सुख का त्याग कर दुःख झेला है इसी कारण वो आज नायक कहे जाते है ।

ऐसी ही एक एक नायक है अरुणिमा सिन्हा जिनके जीवन ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया है और संघर्ष करने की प्रेरणा दे रहा है और आगे भी प्रेरणा देता रहेगा।

भारत की अरुणिमा सिन्हा ने इसी साल जुलाई मे इंडोनेशिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पुंकाक जया पर तिरंगा फहराने में सफलता प्राप्त की है । अचानक जब इस न्यूज़ को अख़बार मे पढ़ा तो जेहन मे पांच साल पहले की एक घटना दिमाग मे घूम गयी कि कही ये वही लड़की तो नहीं है। या कही वो लड़की तो नहीं है जिसने २-३ साल पहले हिमालय पर्वत पर चढ़ाई की थी

कौन है अरुणिमा सिन्हा -

उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर के शाहजादपुर इलाके के पंडाटोला मुहल्ला के एक छोटे-से मकान में रहने वाली अरुणिमा सिन्हा के बचपन से ही जीवन का बस एक ही लक्ष्य थाः भारत को वॉलीबॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना. इसके लिए के उन्होंने कक्षा 6 से ही प्रयास करना शुरू कर दिया। साथ साथ पढाई भी जारी रखी। समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री लेने के साथ अरुणिमा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाने लगीं.

इसी बीच 11 अप्रैल, 2011 की एक घटना ने उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी. . जब पद्मावत एक्सप्रेस से वह दिल्ली जा रही थीं। बरेली के पास कुछ अज्ञात बदमाशों ने उनके डिब्बे में प्रवेश किया।

अरुणिमा को अकेला पाकर वे उनकी चेन छीनने लगे। छीना-झपटी के बीच बदमाशों ने उन्हें ट्रेन से नीचे फेक दिया। जिससे उनका बांया पैर कट गया।

लगभग सात घण्टों तक वे बेहोशी की हालत में वही पड़ी रही और तड़पती रहीं। सुबह टहलने निकले कुछ लोगों ने जब पटरी के किनारे अरुणिमा को बेहोशी की हालत में पाया तो तुरंत अस्पताल पहुंचाया। और वहां से दिल्‍ली के एम्‍स में भर्ती कराया गया। एम्स में इलाज के दौरान उनका बाया पैर काट दिया गया।

लोंगो को लगा की बास्‍केट बॉल की राष्‍ट्रीय स्‍तर की खिलाड़ी के रूप मे यह लड़की अब अपने जीवन में कुछ नहीं कर पायेगी। लेकिन उन्होंने जि़न्दगी से हार नहीं मानी और जीबन को एक खेल मान कर फिर से उठ खड़ी हुई।

आगे एम्स  मे बिताये हुए इन चार महीनो ने अरुणिमा की सोच , साहस और हौसला को और भी मजबूत किया और विश्व की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट को फतह करने का एक नया संकल्प लिया।

इस संकल्प को मूर्त रूप देने के लिए अरुणिमा एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली महिला पर्वतारोही बछेंद्रीपाल से मिलने जमशेदपुर पहुंची ।

और अपने लक्ष्य पर कार्य शुरू किया। बछेंद्रीपाल की देखरेख में नेपाल , लेह , लद्दाख मे पर्वतारोहण के गुण सीखे |उत्तराखंड के नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनिंग और टाटा स्टील के प्रशिक्षण लेने के बाद 1 अप्रैल 2013 को उन्होंने एवेरेस्ट की चढ़ाई शुरू की और 52 दिन के बाद 21 मई को वे एवरेस्ट की चोटी फतह करने वाली पहली महिला विकलांग / दिव्यांक पर्वतारोही बनी |

अरुणिमा का मानना  है विकलांगता व्यक्ति की सोच में होती है। हर किसी के जीवन में पहाड़ से ऊंची
कठीनाइयां आती हैं, जिस दिन वह अपनी कमजोरियों को ताकत बनाना शुरू करेगा उस दिन हर ऊँचाई बौनी साबित होगी। अरुणिमा ने  इस साबित भी किया। 

अरुणिमा सिन्हा यहीं नहीं रुकी इसी क्रम में वे अफ्रीका की किलिमंजारो और यूरोप की अल्ब्रुस चोटी पर तिरंगा फहराया |

अरुणिमा ने केवल पर्वतारोहण , बल्कि आर्टिफिसियल ब्लेड running में भी अपना नाम उज्जवल किया है ,

चेन्नई में हुए ओपन नेशनल गेम्स पैरा में 100 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता |

उसके बाद विश्व के चार अन्य महाद्वीप पर सफल झंडा रोहण किया इसमें अफ्रीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका , की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा फहराया हैं।

उनकी एक पुस्तक है born again in mountain जिसका विमोचन माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने किया है।

भारत सरकार ने अरुणिमा को पदमश्री सम्मान भी दिया है।

आज कल आप उन्नाव के बेथर गांव में शहीद चंद्रशेखर आजाद खेल अकादमी और प्रोस्थेटिक लिंब रिसर्च सेंटर के रूप में अपने सपने को आकार देने में भी जुटी हैं.

अरुणिमा कहती हैं, ''मैं बस इतना कहना चाहती हूं कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं। पर हमें अपने लक्ष्य से भटकता नही चाहिए बल्कि उनका सम्मान और सामना करना चाहिए।

अरुणिमा का जीबन संघर्ष करने वालो को सदा प्रेरणा देता रहेगा .....
आप की सदा जय हो ...आप को सदा विजय मिले ...मंगल हो

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